Thursday, June 7, 2007

चिन्तन

मैं हूँ तो…ना जाने क्यूँ....कब से.... कब तक.....एक तरंग हूँ....उमंग हूँ....जहाँ से आई...बीते पलों के निशां हैं....आगे का नक्शा तो नहीं ...पर चल रही हूँ...जाना कहाँ है पता तो नहीं...पर कहीं पहुँचना है...रास्ते पर हूँ.....मंजिल कोई तो है....शायद......शायद नहीं भी.....नहीं..कुछ तो वजह होगी मेरे होने की....क्या हर बात के पीछे वजह होती है....

क्या अलग है मुझ में और निर्जीव में......अपनी पीढ़ी आगे बढ़ाने की क्षमता.....??
क्या अलग है मुझ में और मक्खी में...जू में....मच्छर में..... विचार??

आत्मा है क्या.....कहाँ....
आधीन ....स्वाधीन...
अधूरी या पूर्ण.....

दुख, सुख, खुशी, दर्द,आह्लाद, उन्माद......सब माया है.....

क्या मैं माया हूँ...??

मैं हूँ...कि नहीं हूँ??

रोशनी क्या है....आवाज़ क्या है.....

बस एक तरंग...मुझ जैसी ही.....

अगर आँख खुली हो तो रोशनी है.....नहीं तो रोशनी का मेरे लिये कोई अस्तित्व नहीं.....

मैं सुनु तो आवाज़ है...नहीं तो.....

क्या किसी के लिये मेरा होना न होना भी उनकी इन्द्रियों पर आधारित है?

और अँधकार क्या बला है....इसे तो मैं रोशनी जितना भी नहीं जानती.....सिर्फ रोशनी का ना होना अँधकार है....या अँधकार का मतलब उस रोशनी से है जिसे मैं नहीं देख सकती.....

जो आवाज़ मेरे कर्णों तक नहीं पहुँचती....जिसे मैं नहीं सुनती....वो खामोशी है.....

ख्याल , जज़्बात, अहसास.....क्या यह भी तरंग हैं.....एक निश्चित दिशा की तरफ चलती हुई.......

स्नेह क्या है.....क्या इसका प्रभाव सबसे ज्यादा इसलिये है कि इसमें तरंगों को जन्म देने की क्षमता अत्याधिक है.......इतनी की तरंग सृजन तक पहुँच सके.....??

अहम के पीछे क्या साजिश है.....ईर्श्या ,द्वेष,क्रूरता, महत्वाकाँक्षा.......सबकी जननी है.......??

अहम से क्या हासिल हो सकता है......क्या यह विभिन्न तरंगों की जीवित रहने की चेष्ठा है?

दो विपरीत अहम के मिलने पर.........दोनो का विध्वन्स स्वाभाविक है.....
दो समान अहम मिलने पर....अनुनाद (resonance)......
जीवन संतुलित है.......तरंगों का खेल....हर सकारात्मक तरंग के साथ के लिये एक नकारात्मक तरंग मौजूद......

खेल का निर्णय तय है....शून्य.......

संतुलन बिगड़ने पर खेल बिगड़ जाता है.....

और फिर संतुलन के खातिर होते हैं युद्ध....सूनामी.....शीत काल......

जीवन के तरंग सदिशों (vectors) से हैं.....कितनी भी दूरी तय करो....पर विस्थापन शून्य.....

मेरा अस्थित्व इस खेल में कितना है.......और अगर कुछ भी नहीं....तो फिर विचार भी क्यूं?

कितने सकारात्मक सदिशों से होगा थोड़ा भी विस्थापन..... और कब....होगा भी....या मैं भी.... फिर लीन हो जाऊँगी शून्य में??

10 comments:

Rachna Singh said...

shunaya sae bara kuch nahin
agar aap usmae vileen ho sake to bahut hee achha hoga
zyada to bhatak hee rahen hae

Arvind said...

कविता के अनेक प्रश्नों का उत्तर कविता मेँ ही निहित है.
वैसे ही जैसे जीवन के सारे प्रश्नो का उत्तर भी जीवन मेँ ही निहित है.
जीवन क्या है ? शून्य ?
कविता क्या है? शून्य ? या कुछ अधिक ?
कितना अधिक ?
क्या यह नापा जा सकता है ?
सुख क्या है? शून्य ?
यदि सुख शून्य है तो दुख क्या है? शून्य से कम?
कितना कम?
- अरविन्द चतुर्वेदी
भारतीयम्
http://bhaarateeyam.blogspot.com

हरिराम said...

हर मानव में एक दिन ऐसा ही चिन्तन आता है? अमेरिका के कुछ लोगों को रोटी-कपड़ा-मकान, मनोरंजन की हर सुविधाएँ, स्वाधीनता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक प्रतिष्ठा सबकुछ उपलब्ध होने पर भी वे हिप्पी बन कर भारत चले आते हैं, इसी आत्मा और परमात्मा के मिलन के अनन्त आनन्द की तलाश में।

ईश्वर शीघ्र ही आपकी तलाश भी पूरी करे!

Shastri J C Philip said...

केरल एवं उत्तर-भारत में स्थित एक अन्य चिट्ठाकार से मुलाकात करके खुशी हुई -- शास्त्री जे. सी. फिलिप

Udan Tashtari said...

इसी भटकन का नाम जीवन है.

अरुण said...

वाह वाह मुझे तो अपने बाबा वाले भाषणो के लिये आज लेखक मिल गया
:)

"जीवन को हर पल जीना
कहना सरल है कठिन है जीना
चाहो चांद को
खो जाती है चादंनी भी
फ़िर आने का गम सताता है
वरना छोड दे जिंदगी भी"

Sanjeet Tripathi said...

वाह!!!

रोशनी,अंधेरा,अंधेरा रोशनी
जीवन वृत्त घिरा सदा ही इस दायरे में
पार क्या है किंतु इस दायरे के
क्या है अंधकार और रोशनी के पार
देखा नहीं किसी ने इनसे उपर उठकर
रोशनी के पार अंधकार के बाद भी एक रोशनी है
शायद,
अंतर्तम की अंतर्मन की।
शांति,
गहन शांति की,
पूर्णत्व की शांति की।
पूर्णत्व की तलाश
अर्थात रिक्ति का उद्घोष
अर्थात कुछ पाने की आशा।
फ़िर वही रोशनी की तलाश
पर फ़िर से इस रोशनी के पार भी
एक रोशनी है,
जहां अंतर्तम की अंतर्मन की शांति है,
पूर्णत्व की शांति है,
इसी
पुर्णत्व की शांति की तलाश का ही नाम ज़िंदगी है!!

मोहिन्दर कुमार said...

तलाश ही जीवन है, आस ही जीवन है,
विश्वास ही जीवन है
और निश्च्य ही ये सब सून्य नहीं हैं
ठहराव शून्य है और शायद आपने इसी पडाव पर यह कविता लिखी है

kuldip said...

आप बहुत अच्छा लिखति हैं। आपकी मेरे ब्लौग्स पर की गई टिप्पणियां अति विशिष्ट हैं। मेरी अन्य रचनाओं को भी आपकी टिप्पणियों की आभारी होना चाहेंगी।

kuldip said...

आप बहुत अच्छा लिखति हैं। मेरी कविताओं पर आपकी टिप्पणियां अनमोल हैं। मेरी अन्य रचनायें भी आपकी टिप्पणियों की आभारी होना चाहेंगी।