Saturday, March 24, 2007

पत्रकार क्यूँ बने ब्लौगर- निष्कर्ष

जानती हूँ की आपमे से काफ़ी लोग चाह्ते हैं की अब इस सवाल को फ़िर से उठा कर और विवाद नही खडा़ किया जाये। किन्तु सवाल उछालना आसान होता है…जवाब ढूँढना मुश्किल । लक्ष्य जवाब था इसलिये उस तक पहुँचना मैं अपना दायित्व समझती हूँ ।

पिछले दिनों की बहस में कई लोगो ने हिस्सा लिया। काफ़ी तथ्य सामने आये। किन्तु ऐसा महसूस किया कि इस सवाल ने पत्रकार और ब्लौगर की दूरियाँ और बढा दी हो । इस प्रश्न के पीछे कदापि यह उद्देश्य नहीं था। यह अवांछित था। मै इस दूरी को बढाने मे अपने योगदान के लिये क्षमा मांगती हूँ ।

इस निष्कर्ष तक व्यक्तिगत रूप से पहुँचा गया है। आप में से जिसके भी विचार, शब्द और अवलोकन का इस्तेमाल यहाँ किया है मैं उनकी शुक्रगुजार हूँ ।

प्रश्न की पहली कमजोरी थी कि प्रश्न में पूर्वाग्रह था कि पत्रकार और ब्लौगर दो अलग तरह के जीव है। जबकि दोनों मे काफ़ी हद तक ओवरलैपिन्ग थी। पत्रकार होते हुए भी कुछ ब्लौगिन्ग सिर्फ़ ब्लौगर की ही तरह कर रहे थे। वे इस प्रश्न के दाय्ररे मे सिर्फ़ इसलिये थे क्यूँ कि पेशे से वह पत्र्कार थे।

रवीश जी के शब्दों में ,"ये आत्ममुग्धता का नया संस्करण है। जब से लिखने लगा हूं लगता है मुक्तिबोध या मोहन राकेश हो गया हूं। पता नहीं कहासे आ रही है यह ब्लागमुग्धता। एक चाहत सी उमड़ रही है कि मेरा लिखा अजर अमर होने वाला है। कहीं कोई आलोचक इनकी समीक्षा कर रहा होगा। किसी विश्वविद्यालय में कोई पीएचडी कर रहा होगा। विषय रवीश कुमार का ब्लागमन। क्या ब्लागमुग्धता से आप भी ग्रसित हो रहे हैं। मनोविज्ञान में इसका निदान अभी नहीं है। होम्योपैथी मे पता किया है। कोई ठीक जवाब नहीं दे रहा है। एक सुबह लगा कि काश अखबार निकलना बंद हो जाए और लोग सुबह उठ कर मेरा ही ब्लाग पढ़े। संसद में मेरे ब्लाग पर चर्चा हो। और चुनाव में मेरे ब्लाग को बजट में एलोकेशन देने का वादा हो। क्या मैं निरंकुश होने वाला हूं? क्या ब्लाग पर लिखना बंद कर दूं? ऐसा क्यों हो रहा है? मैं इनदिनों हर काम छोड़ कर ब्लाग पर लगा रहता हूं?" यह एक आम ब्लौगर की मानसिक दशा का एकदम सटीक वर्णन था ।

मेरा एक प्रश्न था- इनका लिखा दुनिया पढ़ती आयी है ,कहा दुनिया सुनती आयी है। नाम भी जाने पहचाने हैं। छपे शब्दों के जादू से तो यह पूर्वपरिचित हैं । फिर क्या वजह हुई कि यह ब्लौगिंग करने लगे???!!!
इस प्रश्न का उत्तर अनामदास जी ने काफ़ी खूबसूरती से दिया।
हमारे मुहल्ले का सबसे सफल हलवाई मिठाइयाँ, समोसे-कचौरी बनाने के बीच समय निकालकर अपने लिए रोज़ तवे पर चार फुल्के ज़रूर सेंकता था, बचपन में हम सोचते थे कि यह पागल तो नहीं, ढेर सारी तरह-तरह की मज़ेदार खाने-पीने की चीज़ें बनाता है और अलग से मेहनत करके सूखी रोटियाँ क्यों खाता है.

बात अब समझ में आती है, बेचारा हलवाई मिठाइयाँ तो बाज़ार की ज़रूरत पूरी करने के लिए बनाता था लेकिन उसे संतुष्टि फुल्के खाकर ही होती थी.
अब पड़ोस की किसी चाची ने तो उससे कभी नहीं कहा, "फुल्के हम घर की औरतें बनाती हैं, तू तो अपनी कचौरियाँ ही खा."



कुछ और जो प्रश्न थे-

क्या संपादकों ने इनके शब्दों को इस तरह अपाहिज किया है कि इन्हे अपनी सोच रखने का यह ज़रिया सूझा??
क्या यह दिये हुए विषयों पर बात कर के निराश हो चुके हैं....??
क्या जो लगाम नौकरी ने इन पर लगाई है....उसे बेलगाम कर बेबाक सोच हम तक पहुँचाना चाहते हैं?
क्या यह ब्लौगिन्ग को अपनी कुण्ठा निकालने का एक साधन मानते है?!!

इन सभी का जवाब हाँ मे था…पत्रकारो और ब्लौगर दोनों की तरफ़ से।
पत्रकारों का ब्लौगर्स ने काफ़ी खुशी से स्वागत किया था- जीतू भाई की रवीश जी को दी गई टिप्पणी -
"चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है। हम चिट्ठाकारों के बीच आपका आना विशेष प्रसन्नता की बात है। आपके व्यापक अनुभव से निश्चित ही चिट्ठाकारी समृद्ध होगी और इसे नई दिशा भी मिलेगी। "
से लगभग सभी चिट्ठाकारों का पत्रकारों की तरफ़ का शुरुआती रुख साफ़ दर्शाता है।

मेरी समीक्षा में मैने कहा था ,"अगर इन पत्रकारों के ब्लौग का अवलोकन किया जाये तो इनके बीच एक सामाजिक समता वाद साफ उभरता है । यह एकजुट हैं । "

इस बात का भी अभय जी ने खन्डन किया,"हो सकता है मेरी राय प्रमोद भाई से मेल खाये..क्योंकि वो मेरे दोस्त हैं और कई मसले ऐसे हैं जिस पर हम एक तरह से सोचते हैं और कई मसले ऐसे भी हैं जिस पर हमारी राय मुख्तलिफ़ हैं.. फिर रवीश कुमार से मेरा परिचय तक नहीं .. लेकिन उनके ज़्यादातर विचारों से मैं बराबर सहमत होता हूँ.. अविनाश से एक दफ़ा मिला हूँ.. पर उनसे कई मामलों में असहमतियां हो सकती हैं.. और बहुत सारी सहमति भी...लेकिन इस सहमति में कोई योजना नहीं है..""

और दूसरी ओर कुछ सामाजिक सरोकारों वाले लोग जो अखबारी दुनिया में आये तो थे अपने कुछ सरोकारों को ज़बान देने अपनी बात कहने के लिये मगर जिनके मुँह पर पट्टियां बाँध दी गईं हैं ताकि वो अपनी बात न कह सके.. और उन्हे आगे खड़ा कर के पीछे से बाज़ार अपनी बातों का टेप चला रहा है.. ये पत्रकार बाज़ार के द्वारा सताये गये हैं इसी लिये एक मंच मिलने पर ज़ोर ज़ोर से अपनी बात कहरहे हैं"

जहाँ तक मैं समझती हूँ हममें से अधिकांश लोग इस से सहमत है। काफ़ी लोगो को शायद इन्तज़ार भी था कि यहाँ यह पत्रकार ऐसी बातें कहेंगें जो यह बाज़ार और नौकरी की सीमाओ में रहकर नही कह पा रहे। काफ़ी हद तक रवीश जी इस लक्ष्य की ओर चल भी पडे। और जैसा की प्रमोद जी ने कहा हमें लगभग हर रोज़ ताज़ा गुलाब जामुन नसीब होने लगे।

फ़िर कब और कहाँ यह रुख बदला और क्यूँ ?

शायद इनका जवाब जीतेन्द्र जी की इन टिप्पणियों में है। सन्दर्भ है दो कवरेज का ।"

मै सबसे पहले यह जानना चाहूंगा कि नीलेश वाले मसले मे हमारे मीडिया वाले ब्लॉगर साथियों ने क्या किया?
क्या नीलेश से बात की गयी?
क्या उस रिपोर्ट पर कोई स्पष्टीकरण दिया गया?
क्या कोई कवरेज की गयी?

भैया कहना आसान है, और ये तो कोई नही मान सकता कि अविनाश भाई से कोई हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे मे पूछे और अविनाश भाई नारद के बारे मे बात करना भूल जाए। कैसे भूल गये भैया? अगर भूल भी गए तो कोई बात नही, नीलेश को कुछ कहो तो कम से कम, वो भी नही कहना तो चलो कोई बात नही, क्या अब भी हम कुछ उम्मीद रखें?
जिस तरह अगर आपको ब्लॉग मे तकनीकी दिक्कत आए और हम आपकी सहायता करने आगे ना आए, तो आपको बुरा लगेगा कि नही। ठीक उसी तरह आप ब्लॉगर है और मीडिया से है इसलिए मीडिया सम्बंधी बातों मे भी हमे उम्मीदे भी आपसे ही है।

अविनाश भाई, यदि हमने खबर को गलत तरीके से लिया तो आपने भी बात करके हमे साफ़ साफ़ नही बताया कि आखिर माजरा क्या था? कैसे एडीटर की कैंची सिर्फ़ नारद की बात पर चली, बाकी पर नही। स्पष्टीकरण तो आपको ही देना होगा, या नीलेश को।"

दो बातें थी-
• हिन्दी चिट्ठाकरिता का जिक्र्…नारद नदारद…जबकि बाकी सभी मुख्य लिंक मौज़ूद
• पत्रकारों का खास कवरेज


नारद की पत्रकारों से एक अपेक्षा थी…जो पूरी नहीं हुई। हिन्दी चिट्ठाकारिता का जो रूप मिडीया में दिखाया गया वह झूठ ना होकर भी पूरा सच नही था।
अविनाश जी ने इस बात का उत्तर देते हुए कहा था
"हिंदुस्‍तान में नीलेश ने मोहल्‍ले का प्रचार नहीं किया। बल्कि मोहल्‍ले के से जुड़े एक अदद अविनाश से इंटरनेट पर हिंदी ब्‍लॉग्‍स की बढ़ती धमक पर राय ली। कोई बता दे कि एक भी बात मैंने अपनी प्रशस्ति में गायी हो। अब बिना किसी परिचय के नीलेश ने मुझसे ही बात करने की ज़रूरत क्‍यों समझी, ये तो नीलेश से ही पूछा जाना चाहिए। उसके बाद आरोप लगाना चाहिए।"

कुछ भी साबित करने की दिलचस्पी भी मेरी नही है ।

सोचने वाली बात है की नारद को अपेक्षा थी जो पूरी नहीं हुई।
अविनाश जी की ही दूसरी टिप्पणी ,"जब इनकी परिधि के बाहर कोई चमकता हुआ-सा दिखता है, इन्‍हें घबराहट होने लगती है। " भी सोचने पर मजबूर करती है।
क्या यहाँ प्रतिस्पर्द्धा का कोई मुद्दा है??
प्रतिस्पर्द्धा से तो अधिकतर प्रोडक्ट में उन्नति ही आयी है। इसलिये अगर ऐसा है भी तो यह हिन्दी के लिये अच्छा ही होगा।
किन्तु ऐसा भाव इससे पहले नही था। शायद जरूरत नही रही हो…। या शायद उस समय बाज़ार में इसका मोल ना के बराबर था।
प्रतीक जी की टिप्पणी ( जो की हिन्दी ब्लौग्स को सन्चालित करते हैं ) इस बात को और साफ़ करती है-
"जहाँ तक नारद का प्रश्न है, इसका मूल पूर्णत: लोकतांत्रिक विचारधारागत प्रणाली पर अवस्थित है और किसी अन्य ब्लॉग एग्रीगेटर के विरुद्ध नहीं है चाहे उसे कोई और ब्लॉगर खड़ा करे या बाज़ार या फिर कोई और। इसका उदाहरण एक अन्य हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर HindiBlogs.com है। जब किसी कारणवश मैं HindiBlogs को बंद करने पर विचार कर रहा था, तब नारद के प्रबन्धक जीतेन्द्र चौधरी ने ख़ुद इसको बन्द न करने की अपील की थी और नारद की इसी सर्वसमंवयी नीति के कारण आज भी हिन्दीब्लॉग्स.कॉम सुचारू रूप से अपनी भिन्न नीति के अनुसार कार्यरत है। नारद का काम महज़ एग्रीगेशन को अपने वैचारिक आदर्शों, जो हिन्दी ब्लॉग जगत के शुरुआती दौर से उसकी उन्नति के साथ सहज तौर पर विकसित हुए हैं, को आधार बनाकर हिन्दी चिट्ठों को पेश करना है।"


जगदीश जी नारद को एक अनूठा प्रयोग कह्ते हैं । …यह है भी अनूठा । और कितनी भाषाओं में ऐसा प्रयोग है? कहाँ लोग सिर्फ़ भाषा, साहित्य और सँस्क्रिति के प्रेम की वजह से चिट्ठाचर्चा करते हैं …?

आर्यभट्ट ने शून्य दिया था…कुछ नया सन्सार को देने के काबिल हम आज भी हैं ।

इस्वामी जी ने एक लिंक दिया था-http://www.upi.com/NewsTrack/Business/20070125-034637-2375r/

पढने लायक लगा। अमेरिका मे प्रिन्ट मीडिया मे लोगो के नौकरी खोने की बात थी।

वहाँ से,


"A sea change in the way people get and read news, not to mention the way they search for jobs, used cars and consumer products, was the primary contributor," the company said.
"These organizations will continue to make adjustments as their focus shifts from print to electronic," Chief Executive John Challenger said. "Until they can figure out a way to make as much money from their online services as they are losing from the print side, it is going to be an uphill battle." "

यह चिन्ता सिर्फ़ अमेरिका के मीडिया की नहीं हो सकती। यह बदलते दौर में हर मीडिया हाउस की हो सकती है। ऐसे में इस सभावना से पूर्णतया असहमत नही हुआ जा सकता। हो सकता है की मीडिया बाज़ार का अन्दाज़ा लगाना चाह्ती है।
बहरहाल इस थ्योरी को साबित भी नही किया जा सकता… और रद्द भी नही किया जा सकता। कन्स्यूमर होने के नाते हम सजग जरूर रह सकते हैं । और क्या पता फ़ुल्के बनाते बनाते ग्रह उध्योग ही शुरु कर सकें ।

एक प्रश्न था क्या यह समाज को कोई दिशा देना चाह्ते हैं ?
चाहती थी कि उत्तर हाँ मे हो…किन्तु इसका उत्तर मिला ही नहीं ।फ़िर दुहराना चाहूँगी ,"पत्रकार मदद करने में सक्षम ज़रूर हैं । बेबसी की आवाज़ नहीं होती…यह उसे अवाज़ दे सकते हैं । यह समाज की सोच तथ्य सामने रख कर बदल सकते हैं । यह नेताओं के चेहरे से नकाब खींच सकते हैं । यह ज़रूरत की जगहो पर सही सहायता नियोजित कर सकते हैं । यह क्रान्ती और शान्ती की आवाज़ हो सकते हैं।"क्या कोई भी ऐसा पत्रकार नहीं जो वास्तव मे समाज को एक सार्थक सही दिशा देना चाहता है?

एक सवाल यह भी था- क्या पत्रकार हम जैसे आम ब्लौगरों की तरह ही हैं......??!!!
शायद नही ।
कई कारण हैं ।
• लेखन से इनका पूर्व परिचय
• अनुभवों की विविधता
• मीडिया से खास सम्पर्क
• सनसनीखेज़ खबरों के बीच की इनकी ज़िन्दगी


कहते हैं कुत्ता आदमी को काटे तो वह खबर नहीं है…आदमी कुत्ते को काटे तो खबर है।
पर ज़िन्दगी अखबार नही । यहाँ कई घरों मे कुत्ते अखबार बाहर से उठा कर घर में लाते हैं । टी वी मे निठारी की खबर जब पापा देख रहे होते हैं …माँ पूर्णतया आश्वस्त हो अपने बच्चे को सुला रही होती है। वूल्मर की हत्या बातचीत चालू करने का सहारा बन जाती है।

हर इन्सान की अपनी खुशियॉ और मज़बूरिया हैं । अपनी उपलब्धियाँ और निराशाये हैं ।

हम मे से जिनके पास अपना ब्लौग है…वो जाकर अपनी ज़िन्दगी का कच्चा चिट्ठा कीबोर्ड से ब्लौग पर उतार आता है। जो झाँकना चाहता है झान्क ले…नही तो नही सही…

हाँ बात जितनी रुचिकर ढ़ंग से कही जायेगी उतने लोग पढना चाहेंगे । सच, जज़्बा, साहित्य,बहस, तकनीकी सुझाव्…या बस यूँ ही कुछ भी…जो भी रोचक और दिलचस्प होगा पढा जायेगा।

और पत्रकार आकर लिखे…तो हम कितनी ही ज़िन्दगियो को करीब से देख पायेंगे । उनके अनुभवों से कुछ हमारी धारणाओं को रूप मिलेगा… हमारी बातों से वह सामान्य ज़िन्दगी के करीब रहेंगें । कुछ दोस्त बनेंगे …। कुछ सपने जो हम स्वयं पूर्ण करने मे सक्षम नही …वो एक दूसरे के साथ चलकर पूरा करने में सक्षम होंगें । अलग अलग कार्यक्षेत्र के लोग दुनिया के अलग अलग जगह से जुडेगे। हम भी थोडा सा समाज का निर्माण करेंगें।

अनामदास जी ने कहा,"कुछ लोग इस बात से चकित हैं कि इतने पत्रकार क्यों ब्लॉग लिख रहे हैं लेकिन मैं तो सोच रहा हूँ जिन्हें नाज़ है क़लम पर वो कहाँ हैं. बहुत कम पत्रकार ब्लॉग लिख रहे हैं, शायद उन्हें मालिक की चक्की पीसने से फ़ुरसत नहीं है या फिर उन्हें अभी माध्यम के तौर पर ब्लॉग की ताक़त और उसके मज़े का अंदाज़ा नहीं है. ब्लॉग लिखने की ज़रूरत शायद हर दूसरे पत्रकार को देर-सवेर महसूस होगी."

मैं उम्मीद करती हूँ की हमें ऐसे पत्रकारों की कलम से परिचित होने का अवसर मिलेगा।

जैसा की प्रमोद जी कहते हैं ,"जैसे-जैसे सुलभता बढ़ेगी, नये खिलाड़ी आयेंगे. बाज़ार के विचार, सेक्‍स और सामान बेचनेवाले.हमारे लिए तो वह स्‍वास्‍थ्‍यकर चुनौती होनी चाहिये. नये चैलेंजेस का मज़ा लेने की बजाय हम नये विद्यार्थियों की तरफ ढेला क्‍यों फेंके?"

उम्मीद है की ऐसे लोग भी आगे आयेंगे जो हिन्दी चिट्ठाकारिता को नई चुनौतियों से लडने के काबिल बनायेंगे ।

बहस यहीं समाप्त करती हूँ ।

इस बहस से किसी को भी ठेस पहुँची हो तो क्षमा चाहती हूँ । किन्तु समझती हूँ कि बिना कहे, पूछे, सोचे…समझे राय बना लेने से अच्छा है कि बहस हो…।

ना जाने क्यूँ ऐसा लगता है की हम जितने भी लोग हैं सभी अपनी मिट्टी की सौन्धी खुश्बू से बहुत प्यार करते है…
ख्यालो मे बहुत ख्वाब पाल कर चलते हैं …
कुछ कहना चाहते हैं …कुछ करना चाहते हैं …


क्या कुछ पक्की …कुछ कच्ची घोडिया मिलकर इस खेल का मजा नहीं ले सकते…??

4 comments:

rachana said...

वाह बेजी!! तमाम उलझी हुई बातें तुमने बडे ही सुलझे हुए तरीके से रखीं...पिछली पोस्ट और उससे जुडी तमाम पोस्ट भी पढीं, लेकिन टिप्पणी का साहस नही कर पाई..

संजय बेंगाणी said...

बहुत खुब. क्या जबरदस्त विश्लेष्ण किया है.


आपने तो इस विषय पर पी.एच.डी. कर ली :)

Anonymous said...

कोई ऊँचे आसन पर नहीं बैठा है, आपको पूरा हक़ है सवाल उठाने का, आपके सवाल से ब्लॉगर और पत्रकार के बीच कोई दूरी पैदा नहीं हुई बल्कि पत्रकारों को सोचने का और ग़ैर-पत्रकारों को उन्हें समझने का एक अच्छा अवसर मिला. नारद पर ऐसी बहस छिड़ती रहे तो बहुत आनंद आता है.ज़्यादा संवेदनशीलता दिखाएँगे तो दूसरे आपको कभी नहीं बताएँगे कि वे आपके बारे में क्या सोचते हैं और कभी नहीं जान पाएँगे. अनामदास

Beji said...

Anil Sinhaजी...माफ कीजिए आपकी टिप्पणी प्रेषित करने में देर हुई...

पत्रकार हो या आम इन्सान....खरे और खोटे दोनो में होते हैं...यह लेख लिखने का उद्देश्य पत्रकारों के जीवनचर्या पर बहस करना भी नहीं था....

आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद।