हर ब्लौगर की ब्लौगिंग करने की एक वजह होती है। सभी कुछ ना कुछ कहना चाहते हैं । थोड़ा दिमाग कीबोर्ड से अपने ब्लौग पर उतार देते हैं। अगर कोई पढ़े तो अच्छा लगता है....आखिर कोई मुझे भी सुनता है। खुद के शब्द कम्प्यूटर स्क्रीन पर देख कर भी मन एकदम प्रसन्न हो उठता है।
नारद पर अपने ब्लौग का लिंक और उस पर आई हिट्स भी देख कर एक अजीब सी खुशी हासिल होती है। खुद को लेखक,कवि और ब्लौगर के रूप में देखना भी मन को आनन्दित कर देता है।
छपे शब्दों में एक अजीब सी मुग्धता होती है। कुछ चित्त को सम्मोहित करती सी ....।
आये दिन महसूस किया की काफी पत्रकार ब्लौगिंग पर उतर आये हैं। उनका जोश भी उनकी तरफ एकदम से ध्यान आकर्षित कर देता है।
थोड़ा आश्चर्य हुआ.....।
इनका लिखा दुनिया पढ़ती आयी है ,कहा दुनिया सुनती आयी है। नाम भी जाने पहचाने हैं। छपे शब्दों के जादू से तो यह पूर्वपरिचित हैं । फिर क्या वजह हुई कि यह ब्लौगिंग करने लगे???!!!
कहते हैं कलम इस दुनिया में सबसे सशक्त साधन है।
यह क्रान्ती, शान्ती और भ्रांति लाने में सक्षम है।
मन हुआ कि मैं इस विषय को थोड़ा और कगालूँ।
ब्लौगिंग के कुछ फायदे एकदम साफ थे ।
• यह असम्पादित है
• तुरंत प्रतिक्रिया मिलती है
• सीमारहित शब्दों की संख्या का इस्तेमाल किया जा सकता है
• विषयों का फैलाव बहुत है
• बेबाक राय दी जा सकती है
• विश्व व्याप्त पहुँच है
मैं जितना इस विषय के बारे में सोचती हूँ मेरे मन में और सवाल उठ जाते हैं ।
क्या संपादकों ने इनके शब्दों को इस तरह अपाहिज किया है कि इन्हे अपनी सोच रखने का यह ज़रिया सूझा??
क्या इन्हे टीवी और समाचार पत्र पर इससे कम प्रतिक्रिया मिलती है??
क्या यह दिये हुए विषयों पर बात कर के निराश हो चुके हैं....और हम तक कोई ऐसा सच पहुँचाना चाहते हैं जिसके हम हकदार हैं??
क्या जो लगाम नौकरी ने इन पर लगाई है....उसे बेलगाम कर बेबाक सोच हम तक पहुँचाना चाहते हैं?
क्या यह मीडिया से मिली पहचान का आधार बना कर विश्व व्याप्त पहचान बनाना चाहते हैं ??
क्या यह ब्लौगिन्ग को अपनी कुण्ठा निकालने का एक साधन मानते है?!!
…………….या फिर यह भी हम जैसे आम ब्लौगरों की तरह ही हैं......??!!!
अगर इन पत्रकारों के ब्लौग का अवलोकन किया जाये तो इनके बीच एक सामाजिक समता वाद साफ उभरता है । यह एकजुट हैं । इनकी क्षमता और पहुँच इसलिए महत्वपूर्ण है ।
हो सकता है कि इन पत्रकारों ने भी नही सोचा की उनकी ब्लौगिन्ग का शौक मेरे जैसे लोगों की उत्सुक्ता का विषय बन जायेगा । और मैं खामखा ही अपनी ऊर्जा व्यर्थ कर रही हूँ ।
परन्तु क्या सतह के नीचे कुछ हलचल है ?
यह तो निश्चित है की यह लोग समाज के रीती रिवाज से परिचित हैं । समाज के मनोविज्ञान को भी खूब समझते हैं । ब्लौगिन्ग की दुनिया को समाचार पत्र की तरह ही देख रहे हैं। और हर सनसनी खबर को और सनसनी बना कर प्रेषित करने में माहिर हैं ।
स्वाभाविक तौर पर ब्लौगिन्ग करने से पूर्व इन्होने पाठकों के प्रतिक्रिया को आँका होगा।
क्या यह किसी पूर्वनियोजित योजना के तहत है?क्या इनके पीछे इनके अलावा कोई सन्गठन, अन्य व्यक्ति या कोई घुट है ? क्या इनके ब्लौग पर प्रेषित राय सिर्फ़ किसी एक व्यक्ति की है या इन सभी की?!!
क्या यह समाज को कोई दिशा देना चाह्ते हैं ?
यह सवाल महत्वपूर्ण हैं । उत्तर हमें खोजने होंगे ।
दिमाग स्पन्ज की तरह होता है। आसपास मिली सूचना को तुरन्त सोंक लेता है। हमे पता भी नही चलता और हमारी राय बदल जाती है।
क्या हमारी राय बदलने की योजनाबद्ध कोशिश है??
ब्लौगिन्ग आम इन्सान को मिला सबसे श्रेष्ठ साधन है। यह हर इन्सान को अपनी सोच बिना दबे सामने रखने का श्रेष्ठतम जरिया है । यह पूरे विश्व में अलग अलग व्यवसाय , देश, धर्म, मत,दृष्टिकोण से जुड़े लोगों के जीवन का कच्चा चिट्ठा सामने रखता है। इन चिट्ठों को रिपोर्टरों या सम्पादकों की जरूरत नही है। यह वह लोग हैं जो अपनी अपनी जिन्दगी जी रहे हैं और हमें उसकी झलक भी दिखा रहे हैं । यह एक अवसर है कि दुनिया के हर कोने से हम आगे आकर हिन्दी की एक पहचान बना सके।
उन्मुक्त हो गा सके....हिन्दी हैं हम....हिन्दी है हम.....वतन है हिनदोसिताँ हमारा .....
सबसे ज्यादा जरूरी है की यह जारी रहे।
बिना संपादन के....बिना राजनीतिक नेताओं के....बिना मीडिया के..... हम अभिव्यक्ति के लिए ब्लौगिंग में स्वतंत्र हैं।
इस कार्य में यह पत्रकार क्या भूमिका निभा रहे हैं ?क्या यह इसमे मदद कर रहे हैं या यह इतना ऊँचा बोलना चाह्ते हैं की बाकी आवाज़ इनकी आवाज़ के नीचे दब जाये ??
हाँ यह मदद करने में सक्षम ज़रूर हैं ।
बेबसी की आवाज़ नहीं होती…यह उसे अवाज़ दे सकते हैं । यह समाज की सोच तथ्य सामने रख कर बदल सकते हैं । यह नेताओं के चेहरे से नकाब खींच सकते हैं । यह ज़रूरत की जगहो पर सही सहायता नियोजित कर सकते हैं । यह क्रान्ती और शान्ती की आवाज़ हो सकते हैं।
इनके पास आग है…यह क्या करना चाह्ते हैं ?…..रौशन भी कर सकते हैं और आग में सब खाक भी कर सकते हैं !!
कई बार स्वयं को स्वंय की शक्ति का अन्दाजा नहीं होता।
कहीं ऐसा तो नहीं कि इन पत्रकारों को भी खुद की शक्ति का अन्दाजा नही ?
या कहीं ऐसा है कि इन्हे इनकी शक्ति का पूर्वानुमान है ??
जब पहली बार मैने पत्रकारों को ब्लौगिन्ग की दुनिया मे देखा था; बहुत खुश हुई थी। पत्रकारों को समकक्ष पाना काफ़ी गौरव की बात लगी थी। मानती थी कि यह दबी आवाज़ को बुलन्द बनना सिखायेंगे ।
आज ना जाने क्यूँ ऐसा मह्सूस करती हूँ कि शायद यह कुछ बुलन्द आवाज़ों को भी दबाना चाहते हैं ।
शायद यह ऐसा करने में भी सक्षम हैं । ना जाने क्यूँ सुनना चाहती हूँ की मेरी सोच बेबुनियाद है।
किन्तु यह सिर्फ़ समय ही तय कर सकता है। निर्णय आने तक गुजरने वाला समय लौटाया नही जा सकता। इसलिये निर्णय समय पर छोड देते है किन्तु अपने विवेक की खिड़कियाँ खुली रखने के लिए खास ध्यान दे सकते हैं।
हम सभी को अपनी अवाज़ साफ़, अनुत्तेजित, और सहज रखनी होगी। अपनी बात संयत तरीके से कहनी होगी। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता किसी झुन्झलाहट में या किसी अभद्रता में खोने से बचानी होगी।
खुद की आवाज़ इतनी बुलन्द बनानी होगी की किसी भी ऊँची आवाज़ मे नही दबे।
…देखना यह है कि क्या इनकी आवाज़ भी सबके साथ शामिल होगी?!!
काश.........!!
सूचना- यह लेख कहीं और छापने की अनुमति मैने नहीं दी है।
Wednesday, March 21, 2007
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8 comments:
आप इतना सशंकित क्यों हैं? मैं तो पत्रकार नहीं, सिनेमा, टीवी, डिज़ाईन वाली लाईन से हूं. और ब्लॉग की दुनिया में हाथ-पैर चलाते ज्यादा वक्त नहीं हुआ, लेकिन मुझे तो नहीं दिख रहा कि बहुत पत्रकार सक्रिय है. हों तो शायद अच्छा ही हो. रवीश को पढ़ना तो मेरे लिए मुंह में ताज़ा गुलाब जामुन रखने जैसा है. दरअसल होना तो ये चाहिये कि अभी और, और हर तरह की लिखवाई का हिंदी ब्लॉग संसार में प्रवेश हो. आपको नहीं लगता?
शायद इस लिए की वहाँ ये वो लिखते है जो उन्हे लिखना पड़ता है, यहाँ अपने मन का लिखना चाहते है.
हाँ खुद को सर्वज्ञानी समझने की पत्रकारों की आदत यहाँ भी नहीं छूट रही :)
शायद सच ये है कि नए माध्यम से परिचित होना चाहते है। लिख कर थोड़ी भड़ास भी निकालना चाहते है, लेकिन एक बात तो पक्की है, ये सभी अपनी मार्केट वेल्यू बढाना चाहते है।
मीडिया वालों की दुनिया मे मे जो चर्चा मे है, वो उतना ज्यादा ’गुडविल’ वाला माना जाता है। शायद टीवी पर ज्यादा समय नही मिल पाने की वजह से इस तरफ़ रुख किया है। लेकिन भई हमे तो इसे हिन्दी चिट्ठाकारों की एक नयी पीढी के तौर पर देखना चाहिए। इससे हिन्दी चिट्ठाकारी मे विविधता ही आएगी।
अलबत्ता इन नव-चिट्ठाकारों कुछ बातें जरुर सीखनी ही होंगी(बदले मे शायद हम भी इनसे कुछ सीखें) खैर धीरे धीरे, नयी बहू को भी घर के सद्स्यों को जानने समझने मे कुछ समय तो लगता ही है।
हो सकता है मेरी राय प्रमोद भाई से मेल खाये..क्योंकि वो मेरे दोस्त हैं और कई मसले ऐसे हैं जिस पर हम एक तरह से सोचते हैं और कई मसले ऐसे भी हैं जिस पर हमारी राय मुख्तलिफ़ हैं..लेकिन इस सहमति में कोई योजना नहीं है.. माफ़ करें बेजी पर आपकी बातों से कॉन्सपिरेसी थ्योरी की बू आ रही है.. मैं कॉन्सपिरेसी थ्योरी के खिलाफ़ नहीं हूँ.. कई जगह ऐसी है जहां पर लगातार कॉन्सपिरेसी होती रहती है हमारे खिलाफ़ पर हम चूँ तक नहीं करते.. राजनीति, व्यापार, बाज़ार, विज्ञापन.. संगठित तौर पर दूसरे लोगों को मूर्ख बना रहे हैं.. सब एक स्तर पर कॉन्सपिरेसी हैं.. कभी हमारा वोट लेने की.. कभी हमारी जेब काट्ने की.. कभी हमारे मन पर कब्ज़ा करने की.. ताकि उसे एक खास दिशा में मोड़ा जा सके.. इसलिये नहीं कि वही साध्य है..बल्कि इसलिये कि वो सिर्फ़ साधन है अपना माल बेचने का.. अगर मैं आपसे साम्प्रदायिकता पर बहस करूँगा तो इसलिये कि मैं आपकी राय इसी मसले पर बदलना चाह्ता हूँ.. लेकिन जब एक विज्ञापन में एक मुसलमान इस देश का नमक खाने की बात करता है तो वह इस बात का इस्तेमाल कर रहा है.. नमक बेचने के लिये.. ये कॉन्सपिरेसी है.. अगर मैं आपसे कहूँ कि ९/११ किसी आतंकवादी ने नहीं खुद अमेरिका ने योजना के तहत अंजाम दिया.. तो आप यक़ीन न कर पायेंगी.. जबकि वहाँ आपको हर किस्म की गंदी से गंदी कुचाल की कल्पना के लिये तैयार रहना चाहिये.. सबसे शातिर लोग सबसे ताक़तवर और खतरनाक खेल को खेल रहे हैं और हम उनसे नैतिक और मानवीय मूल्यों की उमीद करते हैं..और दूसरी ओर कुछ सामाजिक सरोकारों वाले लोग जो अखबारी दुनिया में आये तो थे अपने कुछ सरोकारों को ज़बान देने अपनी बात कहने के लिये मगर जिनके मुँह पर पट्टियां बाँध दी गईं हैं ताकि वो अपनी बात न कह सके.. और उन्हे आगे खड़ा कर के पीछे से बाज़ार अपनी बातों का टेप चला रहा है.. ये पत्रकार बाज़ार के द्वारा सताये गये हैं इसी लिये एक मंच मिलने पर ज़ोर ज़ोर से अपनी बात कहरहे हैं.. मैं पत्रकार नहीं हूं.पर मेरा दर्द भी लगभग वैसा ही है.. टेलेविज़न सीरियल्स की दुनिया के नियम कुछ अलग नहीं हैं..
पिछले कुछ दिनों में हमारे चिट्ठा जगत में पत्रकारों की एक नई जमात आई है । लिखना उनका पेशा है इसलिए उनके चिट्ठों की गति एक सामान्य चिट्ठाकार से कहीं ज्यादा है । इस कारण से हर तरफ वही दिख रहे हैं । अपनी बात अपने विचार को उन्होंने पुरजोर और तार्किक रूप से रखा है।
ये सही है कि उनमें से कुछ का झुकाव पब्लिसिटी क्रिएट करने का रहा है पर दूसरों की बात को वो दबाना भी चाहते हैं , ऐसा मुझे तो अब तक नहीं लगा है । ऐसी किसी भी अवधारणा तक पहुँचने के लिए शायद अभी और वक्त की जरूरत है ।
आपका उठाया गया प्रश्न ना केवल हिंदी चिट्ठाजगत के लिए प्रासंगिक है बल्कि इसके आने वाले भविष्य के बारे में भी सोचने को बाध्य करता है । शुक्रिया इस विषय को सबके सामने रखने के लिए !
प्रमोद जी रवीशजी वाकई अच्छा लिखते हैं। उन्हे पढ़ना भी मैं पसंद करती हूँ। आपकी बात “दरअसल होना तो ये चाहिये कि अभी और, और हर तरह की लिखवाई का हिंदी ब्लॉग संसारमें प्रवेश हो. आपको नहीं लगता?” से पूर्णतया सहमत हूँ।
संजय जी “शायद इस लिए की वहाँ ये वो लिखते है जो उन्हे लिखना पड़ता है, यहाँ अपने मन का लिखना चाहते है.” शायद यह भी सच है।
जीतेन्द्रजी आपकी बात “लेकिन भई हमे तो इसे हिन्दी चिट्ठाकारों की एक नयी पीढी के तौर पर देखना चाहिए। इससे हिन्दी चिट्ठाकारी मे विविधता ही आएगी.” भी बिल्कुल सही है।
अभय जी “.. माफ़ करें बेजी पर आपकी बातों से कॉन्सपिरेसी थ्योरी की बू आ रही है..”
मानती हूँ।.....यकीन मानिए इसी बू की वजह से यह पोस्ट लिखी है। जानना चाहती हूँ कि कोई कॉन्सपिरेसी पक रही है.....या मेरे इन्द्रीयों में ही कुछ गड़बड़ है।
“.. अगर मैं आपसे कहूँ कि ९/११ किसी आतंकवादी ने नहीं खुद अमेरिका ने योजना के तहत अंजाम दिया.. तो आप यक़ीन न कर पायेंगी..” मैं इस विषय पर भी सोच रही हूँ....जब से गूगल वीडियो पर देखा है.....www.improbablecollapse.com www.truth911.net
मनीष जी आपने कहा “अपनी बात अपने विचार को उन्होंने पुरजोर और तार्किक रूप से रखा है। ये सही है कि उनमें से कुछ का झुकाव पब्लिसिटी क्रिएट करने का रहा है पर दूसरों की बात को वो दबाना भी चाहते हैं , ऐसा मुझे तो अब तक नहीं लगा है । ऐसी किसी भी अवधारणा तक पहुँचने के लिए शायद अभी और वक्त की जरूरत है।” मैं भी ऐसा महसूस करती हूँ।
अविनाश जी आपकी टिप्पणी (जो यहाँ नहीं है) “जब इनकी परिधि के बाहर कोई चमकता हुआ-सा दिखता है, इन्हें घबराहट होने लगती है। इसी घबराहट का नतीजा है बेजी की चिट्ठी। बेजी को मालूम होना चाहिए, दुनिया के महान विचार और सर्वाधिक पठनीय सामग्री ग़ैर पत्रकारों की देन है। जहां तक ब्लॉगर्स की बात है, अभी हिंदी में कोई बात करने लायक ब्लॉग नहीं है।” ने मुझे और सोचने पर मजबूर किया।
अन्तरदृष्टि मेरा शौक है। अक्सर खुद में ही उलझी रहती हूँ । इसलिए जब आपने कहा इसी घबराहट का नतीजा है बेजी की चिट्ठी.....मैने फिर सोचा क्या मैं घबराई हुई हूँ.....
नहीं....पर चिन्तन में अवश्य हूँ.....
क्यूँ??!!
अगर घर पर बैठे कोई कहे कि दुनिया चौकोर है...कोई आपत्तिजनक बात नहीं है। पर अगर कोई पाठशाला में अध्यापक यही कहे तो वह गलत होगा।
Midday पर एक टिप्पणी ड़ालने की कोशिश की थी पर कभी प्रेषित नहीं हुई......ना जाने क्यूँ?
जब भी कोई सवाल बहुत परेशान करता है.....उसे गणित की तरह सुलझाना पसंद करती हूँ.....एक थ्योरी बनाओ.....फिर क्रम में आगे बढ़ो.....और उसे सही या गलत साबित करो.....
मुझे सही हल की तलाश है.....आप सभी का इसे सही क्रम में बढ़ाने का शुक्रिया।
पत्रकारों से मेरा पुराना नाता है। अपने अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हुं कि ये टिकने वाले जीव नहीं हैं। थोडे दिन हाथ पैर मार कर जाने वाले हैं :-)। अभी हिन्दी ब्लॉगिंग पत्रकारों के लिए पर्याप्त बडा 'मार्केट' नहीं है। साथ में पत्रकारों की तकनीक की समझ भी उनके लिए एक बडी समस्या है। मेरे हिसाब से इस विषय पर कतई चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
वैसे हमें पत्रकारों का हिन्दी ब्लागिंग का प्रचार करने के लिए धन्यवाद तो देना ही चाहिए। वह वो काम कर रहें है जो कि पहले करना आसान नहीं था। मनुष्य एक स्वार्थी प्राणी है, और अगर उनके वैसा करने में थोडा स्वार्थ है तो भी बुरा नहीं मानना चाहिए। अन्त मैं फायदा तो हिन्दी ब्लागिंग का ही है।
जिस पर हम एक तरह से सोचते हैं और कई मसले ऐसे भी हैं जिस पर हमारी राय मुख्तलिफ़ हैं..लेकिन इस सहमति में कोई योजना नहीं है.. आप का ब्लॉग भाहूत भड़िया हे
क्या आप ए सब हिंदी मे छाप ने के लिए quillpad.in/hindi उपयोग किया
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