Monday, June 8, 2009

मिट्टी और जंगल

वह मिट्टी थी। उस पर एक जंगल उगा था। जंगल जिसकी जड़ें बहुत भीतर उतर कर उसकी रूह को टटोलती थी। कहीं गहरे से नमी खोज लाती थी। ऐसी नमी जिससे जंगल पनपता था। फूल खिलते थे...फल लगते थे। हरियाली,वसंत,पँछी,पखेरू...। वह देना जानती थी। हल्की बारिश में सौंधी खुशबू सा महकना जानती थी। बीज को अंकुरित कर वृक्ष बनाना जानती थी। उसके पास बीज में सोये हुए वृक्ष को जगाने का जादुई मंत्र था। वह मिट्टी थी। जंगल की पकड़ में सिमटी हुई। जंगल के सूखे गले पत्ते... टूटी डालियाँ...मुरझाये फूल ..वह यह सब सहेजना जानती थी।

जंगल के लिए वह जीवन थी.......जादू थी....ज़मीं थी.......

मिट्टी के लिए जंगल एक वजह थी....जिसके लिए वह थमी थी...... खड़ी थी...।

Saturday, June 6, 2009

तलाश

ऐसे लगता है जैसे किसी राह की तलाश में जीवन की चेतना पाई हो। और रास्तों के पड़ावों में ना रास्ता याद रहा ना तलाश। जैसे किसी सपने के उगने पर...जागी आँखों के सच धुँधले से पड़ जाते हैं। और सपने के ही मायने दिखाई देते हैं। ऐसे बँधता है मन लगावों के तारों से...कि छटपटा कर सपने में ही कैद होकर रह जाता है। नींद से जगना फिर भी आसान ही है...अधूरी चेतना से जागना बहुत मुश्किल। कहीं कोई चेहरा, कोई खुशबू, कोई स्वाद,कोई स्पर्श ...कोई आवाज़ बहुत अपनी सी नज़र आती है। उसके अपनेपन की वजह भूल जाती है। जैसे किसी दिमागी आहत इंसान से याददाश्त अधूरी खोई हो। पहले इन उलझे हुए तारों में उलझते हैं....फिर इन्हे सुलझाते हुए समय गुजर जाता है। तलाश अक्सर अधूरी ही रह जाती है। इस पड़ाव के आगे ना निकल पाते हैं....और किसी शाप की तरह फिर फिर उसी सपने से गुजर जाते हैं। कभी सोचती हूँ...उस पत्ते के बारे में ....जो जिस्म पहन कर टिड्डे की तरह उड़ सका.....। उस गिरते हुए पँख को देख कर आश्चर्य होता है ...किस तरह पानी में जीवित होकर तैर सका।

.....शायद आता है हम सभी के पास एक ऐसा पल...जहाँ हम फिर रास्तों तक हाथ बढ़ा सकते हैं...। तलाश से मंजिल की तरफ......चेतन, अभिज्ञ। किसी स्क्रिप्ट से पढ़ी कहानी की तरह नहीं। हर निमिष में सजीव रह...अपने रास्ते ...अपनी तलाश तक पहुँच सकते हैं।

उलझे हुए सायों के बीच से कोई रौशनी की पगडंडी सी चेतना.....जो तलाश पर उजाले बिखेर जाती है...।

Photo credit-Cosmic hand NASA

Monday, April 13, 2009

विलीन


तुम उस खुशबू के समंदर सी हो जो लहर लहर सी उठ कर मुझे किनारे से उठा ले जाती है। मेरी साँसों मे घुल यह महक मेरे पोर पोर तक पहुँचती है। तुम्हारी पहचान है इसमें। मुझ तक यह तुम्हारा नाम बन कर आती है। मैने इसे जिस्म पहनते देखा है। और तुम्हारे जिस्म को खुशबू में बदलते देखा है। छूता हूँ तुम्हे तो तपिश में मोम सा पिघलकर जुड़ता ही चला जाता हूँ। तुम्हारे साँचे में ढ़लता ही चला जाता हूँ। मुझे अपने बुलबुलों में बसा कर लहर सी उठती गिरती हो। असमंजस,अनुराग और फिर समर्पण....धूप सा तैरता है तुम्हारी आँखों में...। मैं इन बुलबुलों के भीतर उठता,उभरता हूँ....गिरता उतरता हूँ। तुम्हारी साँसों को चखता हूँ। तुम्हारा स्वाद..। उस अमृत की तरह जो मुझे जीवित करती है। तुम जीवन की तरह दौड़ती हो मेरी नब्ज़ में। तुम्हारा प्रवाह, तुम्हारी गति, उथल पुथल, बेचैन....अपनी धड़कनों पर तुम्हारे लय को महसूस करता हूँ। थक कर ही शायद रुकती हो तुम...मेरे आलिंगन की सीमाओं में ठहरती हो तुम...। छलकती सी तुम...सँभालता हूँ तुम्हे अपने आगोश में....और तुम सिमटती सी चली आती हो। मैं साँस रोक कर सुनता हूँ तुम्हे....तुम्हारी खुशबू में महकता हूँ...। हाँ बस तब ही बदल जाती हो...सिर्फ खुशबू बन जाती हो...मेरी पकड़ से आज़ाद फिर छलक जाती हो। निर्दोष सी कोई हँसी की धुन की तरह...किसी चंचल भोली ललक की तरह...। अपनी गहराई की थाह समझ पाने की चाह...चाँदनी को ओढ़ लेने की आस....सैलाब सा उठती हो तुम....फिर खुशबू में बिखर जाती हो....। मुझे साथ लेकर ....उठ हवा में चल....मेरे साथ...

...बूँद सा मैं...तेरे सतरंगी खुशबू में नम...

तेरे साथ ही फिर ..........सावन सा बरस जाता हूँ....।

Sunday, April 5, 2009

विश्राम


रात थी। और सन्नाटा बिल्किल चुप्प। जैसे बहुत दिनों तक जागने के बाद अनायास ही रात की आँख लगी हो। पत्ते अपनी टहनियों से लटके खड़े थे। बिल्ली आँख मूँदे सो रही थी। उजालों का कहीं नामोनिशाँ नहीं था। सड़क सूनी थी। कोई बत्ती कहीं दूर तक नहीं टिमटिमा रही थी। वह अमावास की रात थी। चाँद भी सायों को ओढ़ कर सो रहा था। हवा स्तब्ध सी खड़ी थी। कभी दबे पाँव अपना भार दूसरे पैर पर टिका देती।

वह सो रहा था। उसकी साँसों की आवाज़ की लय में और भी किसी की साँसे शामिल थी। सुकून से ली गई साँसे जो आत्मा को पँखा झल रही हों। रात सो रही थी। और नींद सब पर पहरा लगाये थी।


इस रात में करवटें नहीं थी....कोई आधे अधूरे...धुँधले हल्के ख्वाब नहीं थे....बस नींद...।

कल एक नया सवेरा था जिसमें थकान नहीं थी।

(पेंटिंग-Evelyn De Morgan-sleep and night)

Tuesday, March 17, 2009

दोपहरी

मार्च एप्रिल का महीना। घनी छाँव सी छनी धूप घर के पिछवाड़े पर पड़ती थी। धूप ,छाँव पहन थोड़ी सी ठंडी होकर गुनगुनी सी बदन को छूती थी। नींबू के पौधों से हल्की सी खट्टास ताज़गी की तरह उठती। मुझे यहाँ बैठना अच्छा लगता था। गर्म हवायें आम के पेड़ की साँसों की तरह चेहरे पर महसूस होती । यहाँ मुझे अकेला नहीं महसूस होता। पत्तों की सरसराहट से लेकर कोयल की कूक सब जाना पहचाना था। कभी अचानक से पकी इमली टप्प सी गिर जाती। बहुत सी आवाज़ों के बीच सुकून सी नि:शब्दता।
सिमेन्ट के चबूतरे पर बैठ छोटे पछीटों को हथेली से उछालती और कल्पना उड़ान भरने लगती। डॉक्टर, इंजीनियर, एस्ट्रानॉट...गुड़िया की शादी के सपने,बड़ी सी गाड़ी के सपने....अच्छे चमकीले कपड़े....ढ़ेर सारे चाभी से चलने वाले खिलौने....। चबूतरे पर जमी लाल मिट्टी पर पाँव चलाती और समंदर के किनारे की रेती को छू आती। पास ही बेल थी..एक घनी बेल जिसपर मोगरे गुच्छों मे खिले होते....उनकी महक हवा में घुली होती। थोड़ा पानी बाल्टी में लेकर, मग के मुँह पर हाथ रख बेल पर पानी छिड़क देती...। मोगरे नहा कर...उछल खूद बेल पर लहराने लगते। और मैं सोचती एक बाड़ी...जिस पर मोगरे ही मोगरे हों..., नीचे साफ सुथरी पक्की क्यारी और बाड़ी पर लगा एक सफेद गेट।

घर के पिछवाड़े की बाड़ी छोटी टहनियों को गूँथ कर पापा ने रामू की मदद से बनाई थी। छोटी मोटी यहाँ वहाँ मुड़ी टहनियाँ कैसे तो पंक्ति में बँध गई थी। धीरे धीरे सँभल कर मैं उनपर हाथ चलाती। चिकनी, फिर खुरदुरी...बीच में काँटे। एक कोने से हिलाओ तो मिट्टी फिसल कर सरक सरक नीचे गिरती।


आँख बंद कर फेफड़ों को फैला कर भरी पूरी एक साँस लेती....और मार्च एप्रिल का जायका मेरे जहन में समा जाता...। पूरे साउँड और विश्अल एफेक्ट्स के साथ।

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महीना मार्च ही है। गर्म हवायें भी हैं। बड़ी सी गाड़ी की स्टीयरिंग व्हील थामे....प्यारी सी गुड़िया को रियर सीट में बैठा कर...फूलों की क्यारियों के बीच से गुजरते हुए.....कैसे तो मन फिर उसी दोपहरी के लिए तरसा है.......।

Tuesday, March 10, 2009

रंग


लाल, पीला, हरा , नीला...कैसे कैसे तो फीके...कैसे चटकीले...कितने सारे रंग। याद है जब टेसू के फूलों से पानी में घुलता था रंग....और हाथों में लगाई मेहंदी पर शक्कर के पानी से चढ़ता था रंग। हल्दी और बेसन....चेहरे पर कैसे कैसे तो निखरता था रंग।

जब पहली बार इँद्रधनुष देखा तो सच में लगा था कोई कूची लेकर बैठा होगा...नहीं तो इतने बड़े आसमान पर कैसे तो उतरा होगा रंग। पता नहीं कब तो बंद आँखों के भीतर से भी दिखने लगे थे रंग। पुतलियों के नीचे से सरक काले को सरका कर हल्का हरा,नीला फिर नारंगी....। कब तो सीखा था...बेरंग हकीकत को सपनों से रंगने का हुनर ।

सूरज के मिज़ाज की तरह जिंदगी भी मन की घटाओं को रंगती जाती। कभी सफेद, उज्जव्ल....कभी अँधेरा सा काला.....लाल, गुलाबी,नारंगी, स्लेटी.... अलग अलग कितने रंग। प्रतिबिंब में बदलते थे रंग....और बिंबों में सजते थे रंग। कुछ आँखों में खुमार बन उमड़ते थे रंग.....कभी गालों पर सिमटते थे रंग...।

रंग भी तो कैसे होते हैं....कुछ पक्के होते हैं...कुछ यूँ ही उतर जाते हैं.....। ऐसे भी होते हैं रंग ....दाग बन उभर जाते हैं..।
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याद रहते हैं वो रंग....जो रूह पर निखर जाते हैं.....मुझ में घुल ...मेरे होने में शामिल......मेरा रंग बन जाते हैं....।





पूरे ब्लॉग परिवार को होली की शुभकामनायें।

Friday, February 13, 2009

हैप्पी बर्थड़े पापा


पापा,

आप से लंबी बाते करना याद नहीं है। बल्कि साथ बैठ कर भी कब की है बातें।

आज एक बच्चे को उठाये एक बेबस से पिता के चेहरे पर डॉक्टर से जल्द से जल्द मिलने की झुँझलाहट देखी और आप फिर याद आ गये। आप को याद होगा जब टाई पकड़ कर भागते हुए एक कुत्ता पीछे पड़ गया था...और मैं गिर पड़ी थी,आप भागे हुए आये थे। अपनी जेब से बड़ा सा रुमाल लेकर तुरंत बाँध, साईकल की आगे की सीट में बैठा कर दौड़ते पहुँचे थे अस्पताल। उस समय का आपका चेहरा इसी आदमी सा था । सिस्टर ने रूखी सी आवाज़ में उसे हिदायत दी थी....मैं खुद को रोक नहीं सकी और कहा था....चिंता मत करो अभी देखती हूँ।

हर रोज़ किसी ना किसी के चेहरे में दिखते हो पापा। कैसा तो सादा सा चेहरा है आपका...किसी से भी मेल खा जाता है। पूरे दिन मेहनत कर ओवरटाइम करते मज़दूरों में दिख जाते हो....कभी किसी छोटी बच्ची के हाथ में पकड़ी छोटी उँगली से लगते हो, कभी स्टील के छोटे टिफिन में सँभाले बेर में आते हो और कभी गरम दूध के ऊपर बने झाग में। कैसे तो मुस्कुरा देते थे मेरी दूध की मूँछ पर और हमेशा भूले बिना लाते थे चूरण की खट्टी मीठी गोली।मेरे ही साथ जिया था आपने अपना बचपन। कँबल के अंदर सर्द रातों में कड़क सी आपकी हथेली माथे को छूती और मैं और ज़ोर से आँखें मीच लेती। फिर धीरे से मिची हुई आँखों के नीचे से देखती आपका स्नेहसिक्त चेहरा...और आपकी आँखें हँस देती।

मुझे याद है हर बात। मम्मी कहती थी नाज़ों में पालोगे तो आदत बिगड़ जायेगी...और आप कहते मेरी बिजु तो राजकुमारी ही है।

डॉक्टर बनेगी ना...आप पूछते और मैं तुनककर कहती और नहीं तो क्या। बन तो गई डॉक्टर पापा ।

आज फोन पर कामवाली ने ही कहा था पापा अस्पताल गये हैं। पूछने की जरूरत नहीं थी, जानती थी आपको जाना था। अच्छा नहीं लगा।
पता नहीं क्यूँ आपकी तरह क्यूँ नहीं हूँ। आप हमेशा तो हर जोखिम से बचा लेते थे। आपका हाथ पकड़ कर कितना,कितना तो सुरक्षित महसूस होता था। तब जब छोटी थी...और फिर तब भी जब बड़ी हुई और ट्रेन में लोग चेहरे पर धुँआ छोड़ देते।

... आप को खतरे में देख कर बौखला जाती हूँ। आप पूछते हैं सब ठीक हो जायेगा ना...और मैं सोचती हूँ कैसे बिगड़ा सबकुछ। आप तो कभी बेबस नहीं होते थे पापा....और जब आप पूछते हैं...बेटा इससे बेहतर कोई इलाज नहीं इसका..तो कितना बेबस महसूस करती हूँ। मैं कोशिश करके आपकी आवाज़ की थकान को आपका बुढ़ापा समझती हूँ...फिर साँस की लड़खड़ाहट सुनकर ...उसे बच्चे को आवाज़ देकर अपनी आवाज़ से ढँक देती हूँ।

मैं सुनना चाहती हूँ आप ठीक हैं, खुश हैं। आप कह भी देते हैं। पर पता नहीं क्यों सुनकर रोने का मन सा होता है।

पता नहीं कब आपने मुझे सही गलत समझाना छोड़ दिया। मम्मी से भी उलझते समय आप ठोकते नहीं अब। आपके लिए मैं बड़ी नहीं होना चाहती,पापा । आपकी डाँटती आवाज़ मुझे बहुत अच्छी लगती है।

क्रिसमस साथ मनाने की जिद थी। सब काम यहाँ वहाँ सरका कर जब घर पहुँचे और उस लंबी सी सीढ़ी पर चड़ कर तारे टाँक रही थी ...तब हाँफते हुए ही आप सीढ़ी पकड़ने चले आये थे। एक बार फिर महसूस किया था आपका मज़बूत सहारा। पूरी कमज़ोरी में भी आपके हाथों ने मज़बूती से मुझे थामा था।

...लंबा आप पढ़ते नहीं.... पापा आपके पास आना चाहती हूँ...

जन्मदिन मुबारक

आपकी प्यारी बेटी।