Thursday, May 5, 2011

घर

माँ घर लौटना चाहती है। उसी घर जिसकी ज़मीन नाना ने पसंद की, फिर पापा और मम्मी ने उसमें एक महल का सपना देखा। मैं छोटी थी तब। शायद आठ साल की। गर्मी की छुट्टियों में मैं सब के साथ जगह देखने गई। नारियल के पेड़, इमली के पेड़, काजू गिरे हुए, नारंगी लदी हुई.....और बहुत सारे लाजवंती के पौधे जिनमें हल्के गुलाबी फूल खिले थे।
सपने जैसा ही तो था सबकुछ। मैने अपना और भैया का कमरा देखा। छत पर गुड्डी के साथ खेलने की जगह सोची। आम के पेड़ और उनपर चढ़े हुए मेरे सारे दोस्त देखे।
नाना मामा को लेकर आये। वे सिविल इंजीनियर थे। उन्होने सपने के घर का एक खाका तैयार किया।
एक एल डी सी क्लर्क और टेक्नीशियन की नौकरी में घर बनाना इतना आसान नहीं था। माँ की दहेज में एक सोने की माला और बाली के अलावा कुछ नहीं आया था। अपने बच्चों को सबकुछ सबसे अच्छा देने की जिद में बचत यूँ भी मुमकिन नहीं थी।
जोड़ तोड़ कर नींव बनाना शुरु किया। नींव ज़मीन पर खाके की तरह खड़ी हो गई। फिर एक दो साल तंगी में यूँ ही खड़ी रही। पापा का तबादला राजस्थान से गुजरात हो गया। मैं कुछ ग्यारह साल की।
हर साल छुट्टियों में हम अपनी जगह देखने जाते। फिर उन्ही पेड़ों को देखते जो कुछ और बड़े हो गये थे। मम्मी पापा ने फिर हिम्मत कर काम शुरु करवाया।
ईंट के बीच से खिड़कियाँ निकलने लगी। दरवाज़ों पर लकड़ी के किनारे लगने लगे। पापा छुट्टियों में जाते थे। और नाना बाकी सब काम देखते थे।
समय ज्यों ज्यों गुजरा काम फिर अटकने लगा। नाना की तबियत खराब रहने लगी। पहले बिस्तर पकड़ा फिर याददाश्त गई। अल्ज़मेयर्स के शिकार नाना मेरी तेरह बरस की आयु में चल बसे।
काम फिर रूक गया। मेरे सपनों में मेरे सपनों का घर बदलने लगा। खुद के लड़की होने का अहसास और ब्याह कर दूसरे घर जाने का ख्याल चिंतित और रोमाँचित करने लगा। मम्मी और पापा को भी शायद यही बात सता रही थी। लड़की के ब्याहने से पहले तो मकान बन ही जाना चाहिये।
नाना इस बीच चल बसे। और मम्मी की जिद ने फिर जोर पकड़ा। इस बार इमारत उठी और इठला कर खड़ी हो गई। तीन बेडरूम, किचन के साथ स्टोर, बरामदा, आँगन, छत और छत की मुंडेर।
सोलह साल की उम्र में गृहप्रवेश। नाम रखा आशियाना....तिनका तिनका जोड़ कर जो बनाया था।
शादी वहीं हुई। विदाई भी। भाई की शादी के बाद एक मंजिल और जोड़ दी गई।
माँ के लिये वही घर है। सालों सरकारी नौकरी के चलते क्वार्टर्स में रहने के बाद कुछ साल चैन से मम्मी और पापा ने गाँव में बिताये। ज़मीन खरीदी। खेती की। नारियल के पेड़ लगाये। आम, आँवला, इमली, चेरी, अमरूद, नारंगी, केला, कटहल.....मिर्ची, अदरक, लहसन, ... हरियाली और अपनत्व।
माँ उसी की तलाश में फिर लौटना चाहती है। मैं नहीं लौटना चाहती। पापा के जाने के बाद उस घर की साँसे ही छिन गई हैं।
मैं भी घर लौटना चाहती हूँ। पर घर सरक कर ना जाने कहाँ चला गया है। कभी बहुत उदास होती हूँ तो पापा आते हैं सपने में। सपने में भी घर का रास्ता ढूँढते पापा के पीछे चलती हूँ। उठते ही लगता है कि दहलीज पर पहुँच रास्ता फिर खो गया है।
मेरे लिये घर हमेशा अपनों के साथ में बसा। शब्दों में और नि शब्दता में। किसी के होने के आभास में...तो कुछ पाने के प्रयास में....। घर किताबों में मिला....तो कभी किसी गीत की धुन में....।
मैं बेचैन रहती हूँ। किसी धुन की रस्सी पकड़ फिर घर पहुँचना चाहती हूँ।
वैसे तो मेरे आँचल में भी एक घर बसता है। बिटिया दौड़ कर जब सिमट जाती है उसे उसका घर मिल जाता है। नींद में आज भी बेटा मेरी खुशबू में शरण पा लेता है। अजनबी भी घर तलाश कर पास ही रुक जाते हैं। दो बातें सेंक सुकून सा पा लेते हैं।
रात को सब किवाड़ देख जब बिस्तर तक आती हूँ। लगता है....घर है ....। मेरे भीतर...।
आ जाओ माँ.... घर लौट आओ...

Tuesday, April 26, 2011

38 वीं सालगिरह



डेढ़ साल हुआ भारत लौटे। बहुत सारे छोटे बड़े इरादे थे। अपने लोगों के बीच अपने लोगों के लिए काम करना था। मम्मी पापा को काकरापार की उसी कॉलोनी की सैर करानी थी जिसमें मैने बचपन के कितने साल बिताये। अप्पन अम्मा के बुढ़ापे में उनके साथ रहना था।
जीवन का अपना एक लय होता है। सभी इच्छायें पूरी नहीं होती।
हाल की मेरी नौकरी की इच्छा को शुरु में सभी ने सनक ही समझा था। और शायद मुझे होश में लाने के लिए ही पूछा था। तुम नज़दीक के इस गाँव के लिए क्या कर सकती हो?!!
करीब सात सौ लोगों की बस्ती। जिसमें गिन के दस लोग भी पढ़े लिखे नहीं। कोई एकाध जिसे देशी दारू का नशा नहीं। और पाँच से भी कम पक्के मकान। काम मुश्किल था और मुझे कोई अनुभव नहीं था। टूटी फूटी गुजराती, थोड़ा प्रयास, थोड़ा विश्वास....। और ढ़ेर सारा जोश।

हर प्रयास के दो नतीजे होते हैं। लिहाजा एक उस बदलाव की तरफ के बदलते किस्से जिसे लक्ष्य बना कर बढ़ा जा रहा है और दूसरा वो जो प्रयास करने वाले के व्यक्तित्व पर होता है।
गाँव में क्या बदला यह तो मैं नहीं कह सकती। किंतु मेरे लिए जीवन को देखने का पूरा नज़रिया ही बदल गया है।
डेढ़ साल। पापा को खो दिया। अप्पन को भी। नई जगह, नये लोग, नये तरीके। काम ऐसा जिसका प्रोफाइल बेहद धुँधला था। उलझी हुई इस गुत्थी का हर सिरा उलझा नज़र आता था। अपनी समझ से सिरा पकड़ सुलझाती गई। और साथ ही पता नहीं चला खुद किन रिश्तों में बँधने लगी। मेरे दिन के सबसे खूबसूरत पल मैं गाँव के इन बच्चों के बीच चुनने लगी। पता नहीं नन्ही मुन्नी गोल मोल आँखों में कब शंका की जगह स्नेह ने ले ली। बहुत धीरे लेकिन बात बदलती गई।
मैने सीखा हँसना कितना आसान है। और खुश होना भी। दो साल के बच्चे की समझ और पाँच साल की बच्ची की खाना पकाने की हिम्मत। स्कूल में पढ़ने की लगन और एक दूसरे के समझने समझाने का हुनर। स्कूल के मास्टर, आँगनवाड़ी की बहन और जवान किशोरी लड़कियाँ।
घर में गाली गलौच, दारू, शराब, मारपीट कुछ नहीं बदला....लेकिन हर सुबह नहा धोकर यह बच्चे बालों में तेल लगा कर, अपना बस्ता उठा कर स्कूल आ जाते हैं। स्कूल साफ कर फिर प्रार्थना की सभा की तैयारी। मुस्कुराते हैं, खेलते और पढ़ते हैं।
मैं स्तब्ध होती हूँ। उनकी लड़ाई से सन्न हो उठती हूँ। वो सोचते हैं मेरे पास उनकी हिम्मत है। मैं रोज़ उनसे थोड़ी हिम्मत उधार ले आती हूँ।
चाहती मैं ही थी कि अपना जन्मदिन इनके साथ मनाऊँ। बताया नहीं था। पर जब पहुँची तो उनकी सौगात से मेरा मन भर आया। केक, गुब्बारे, आसोपालव के तोरण....फूलों की पँखुड़ियाँ और इतनी सारी मुस्कुराहटें।
इससे खूबसूरत कोई जन्मदिन कभी मनाया नहीं। और मन ....वह सदा के लिए उनके स्नेह का ऋणी हो गया।

Saturday, February 12, 2011

हैप्पी बर्थडे पापा


13th February 2011
सबसे प्यारे पापा,
सुबह उठ कर सबसे पहले आपको फोन करने का मन था। मैं अपनी हँसती आवाज़ में गाती हैप्पी बर्थडे और आपकी मुस्कुराती आवाज़ जवाब में पूछती," तू कब आ रही है?" मैं फिर उछल कर पूछती ,"अभी आ जाऊँ पापा?"......आप हँस देते।
देर हो गई। मुझे लगा था वक्त है। आप फिर कहे बिना कहीं भी कभी गए नहीं। मुझे भरोसा था आप रुकेंगे।
शायद आपको भी भरोसा था कि जाने से पहले मैं आ सकूँगी।
यहाँ मौसम अब अच्छा हो गया है। बगीचे में ढ़ेर सारे फूल हैं। बच्चे भी अपने काम खुद निपटाने लगें हैं। आपकी गुड़िया भी बड़ी हो गई है। अपनी पुरानी फोटो देखकर जबतब हँसती है। आपको याद है किसतरह आप उसे एक कमर पर बिठा कर सभी काम करते थे? और वो लार टपकाती हँसती गाती बनी रहती थी। उसकी हँसी बहुत प्यारी है.....बिल्कुल आपकी जैसी।
आपकी याद आती है पापा। बहुत। केरल पहुँचने पर एयरपोर्ट पर आप नहीं होंगे ,यह सोच कर ही मन दुखी हो जाता है। घर के बालकनी पर आपकी कुर्सी की जगह.....अब शायद खाली हो। घर में हर जगह एक जगह खाली है। मैं वहां होती हूँ और ना जाने कहाँ कहाँ से आवाज़ आती है...बिजू...
मुझे अब वहाँ जाना अच्छा नहीं लगता।
काम कर रही हूँ। पूरे दिल से। जब थकती हूँ आप याद आते हैं।
जब हौसला टूटता है....आप कहते हैं....तुम चिंता क्यों करती हो, मैं हूँ ना....
बड़ी दुकानों पर खडी होती हूँ...और गुड़िया कोई खिलौने की जिद करती है तो उसे समझाती हूँ...यह खरीदने का कोई मतलब नहीं। फिर खुद खड़ी किसी चीज़ को देख असंमजस में खड़ी होती हूँ...तो वह कहती है...."मन है तो ले लो ना मम्मी।"... और लगता है जैसे आप ही ने उससे कहलवाया हो।
एक पूरा जीवन। बस देते रहे। कैसे किया आपने पापा? मैं नहीं कर पाती। देने का, लेने का सब हिसाब रखती हूँ। आसानी से माफ नहीं करती....किसी को भी नहीं, खुद को भी नहीं। देने की वजह ढूँढ़ती हूँ। नाराज़ होती हूँ।
पर फिर पाती हूँ कि आप पास ही खड़े हैं। मेरे हर द्वन्द्व के एकदम करीब।
अब आसान हो गया है। सबकुछ। मेरी आत्मा का पता नहीं पर आप साथ चलते हैं। सही पर मुस्कुराते हैं। कभी गुस्सा करते हैं। कभी यूँ मुझसे हताश दिखते हैं कि मैं अपने निर्णय आप ही बदल देती हूँ।
कोशिश करती हूँ पापा.... हर समय वो करना जो सही है आसान नहीं होता।
नहीं कर पाती।
उदास होती हूँ फिर।
पर आपका स्नेह का हाथ फिर सपनों में फिरता है। और हौसला बँध जाता है।
.............
बाकी बाद में। फूल चुनने हैं। मम्मी को फोन करना है। आपके पसंद की खीर बनानी है। कितने तो काम है।

संडे कितना कितना तो प्यारा हुआ करता था आपके साथ। अपने हाथ का सहारा ना सही....कभी अपनी ठोस आवाज़ से ही छूना पापा..... कहीं भी हो...मैं सँभल जाऊँगी।

हमेशा आपकी
बेजी

Thursday, November 18, 2010

भ्रान्ति

सपने और सच में बस जागने भर की दूरी है। उनींदा में रेखायें और उनमें बँधी सीमा धुँधलाने लगती हैं। सपनों की अंटी खुलकर सच पर बिखरती हैं। और सच पर कृत्रिम रंग चढ़ते हैं। सच सपनों की तपिश में पिघलता है,मोम की तरह रूप में ढ़लता है ,पँख बनते हैं और उड़ान बन तितलियों से सपनों के आभासी दुनिया पर मंडराने लगता है। धड़कनों की गति बदलती है....आँखों से समंदर छलकता है....तूफाँ में सच डगमगाने लगता है और रास्ता और अस्पष्ट हो जाता हैं। सच बौखला जाता है अक्सर...और व्याकुल हो चैतन्य को थामता है...जागता है । सपना टूट जाता है और चेतना पर किसी कसैले स्वाद सा रुक जाता है। सच तहकीकात करता है। सपने का रंग क्या था? स्वाद? कोमल था या खुरदुरा ?। कैसी खुशबू थी? उसकी आवाज़ कैसी थी? परीचित आयामों से सपने का प्रारूप बनाना चाहता है। सच अपने ही प्रयास में हताश होता है। थक कर कहता है...सब झूठ है।

Sunday, November 14, 2010

प्रतीति

माँ भाई के साथ चली गई। साथ में पापा की वह तस्वीर भी ले गई जिसपर रोज़ फूल चढ़ाती थी। माँ का कमरा खाली हो गया है।
मैने नहीं पूछा उन्हे यूँ जाना कैसा लग रहा है। कोई समय शायद ऐसा रहा हो जब माँ अकेले भी दुनिया को अपने बस में करना चाहती हो। पर मुझे उनका अकेला होना याद नहीं । पापा की दुनिया माँ से शुरु हो वहीं खत्म हो जाती थी। पास की दुकान ले जाने से लेकर सड़क पार पापा ही करवाते थे। आखिरी बार आई सी यू में ले जाते वक्त पापा हाँफ और साँस के बीच माँ के आराम की चिंता कर रहे थे।
माँ के चश्मे में पापा की तस्वीर और तस्वीर के फ्रेम में माँ की झलक देख मुझे उनके साथ होने का दिलासा होता था।
माँ ने पापा की तस्वीर अपनी शॉल में लपेट कर हैंड बैगेज में रखी थी। दिल को सदमा सा पहुँचा था। फिर याद हो आई माँ के साथ की पापा की निश्चिन्त सी छवि।
माँ को मैने नहीं रोका।
कुछ दिलासों के झाँसों पर ही सही...... जब तक पापा हैं माँ की चिंता करने की जरूरत नहीं.....

Thursday, October 7, 2010

बस इतना सा ख्वाब है....Total Sanitation





तीन साल की लक्ष्मी की आँखें पीली थी। उदास सी वह थकी एक कोने में बैठी हुई थी। यूँ तो हमेशा से उसकी आँखें काले चेहरे पर छलकते मोती सी प्रतीत होती थी। मैं अक्सर उसके चेहरे पर आकर रुक जाती थी। मासूमियत कहीं अनुभव में उलझी सी मिलती थी।


उसकी माँ की पूछती आँखों का जवाब दिया था। “पीलिया हुआ है इसे।“
आँगनवाड़ी में बैठे सब बच्चों की तरफ ध्यान गया था। अब यह ना जाने किस किस को होगा। मेरे हाथ में कुछ खास नहीं था। हाथ धोने तक की हिदायत तो पानी आने पर ही दी जा सकती थी। और बाकी रोज़ संडास के लिए गाँव की कोई भी जगह का इस्तेमाल किया जा सकता था। उसके बाद अगर बिमारी फैलती है तो किसी की बला से।
कुछ ही दिन पहले चर्चित एक वाक्य पर मन लौट रहा था।


Commonwealth Games Organising Committee (CGOC) secretary-general Lalit Bhanot said standards of cleanliness and hygiene differed from one person to the other and what one thought was clean may not appear that clean to others.

एक ऐसी बात जिसको भारत की बेइज्जती का नाम लेकर दुत्कार दिया गया था। सभी को एतराज था....गलत जगह पर,गलत अंदाज़ में और अपने बचाव में किया गया एक भद्दा मजाक। किंतु क्या इसमें कुछ सच्चाई नहीं थी ?!!

मेरा ध्यान खुद पर जाता है। भारत वापस लौटते समय सार्वजनिक स्थलों के शौचालय बड़ी चिंताओं में से एक था। ट्रेन से बाहर देखते समय पंक्ति में बैठे हुए लोग मलोत्सर्ग करते पाये जा सकते हैं। और यह देखकर शिकन की लकीर भी नहीं उभरती है। हम आदी हो चुके हैं। हम वही देखते हैं जो हम देखना चाहते हैं,जितना हम देखना चाहते हैं। मध्यवर्गीय भारतीय की खर्च करने की शक्ति में अच्छा इज़ाफा हुआ है। बड़े कनसेप्ट मॉल और उसके साथ के अच्छे टायलेट्स ,बिग बाज़ार के तंग टॉयलेट्स, हाईवे के निहायती बदबूदार और अस्वच्छ शौचालय और गाँव के गाँव डब्बे लेकर शाम को अपना कोना ढूँढ़ते हुए लोग। हमारे लिए सब जाने पहचाने तथ्य हैं। और इनसे हमारी शान में कोई खास फर्क नहीं पड़ता। मीडिया के लिए यह ऐसा विषय नहीं है जिसपर फ्रंट पेज डिवोट किया जा सके। हाँ अप्रेल की चौदह तारीख को हस खबर को जगह दी गई थी।


Mobile telephones more common than toilets in India, UN report finds


14 April 2010 – More people in India, the world’s second most crowded country, have access to a mobile telephone than to a toilet, according to a set of recommendations released today by United Nations University (UNU) on how to cut the number of people with inadequate sanitation.
“It is a tragic irony to think that in India, a country now wealthy enough that roughly half of the people own phones, about half cannot afford the basic necessity and dignity of a toilet,” said Zafar Adeel, Director of United Nations University's Institute for Water, Environment and Health (IWEH), and chair of UN-Water, a coordinating body for water-related work at 27 UN agencies and their partners.The UNU report cites a rough cost of $300 to build a toilet, including labour, materials and advice.
India has some 545 million cell phones, enough to serve about 45 per cent of the population, but only about 366 million people or 31 per cent of the population had access to improved sanitation in 2008.

सरकार और समाज की उपेक्षा समझ से बाहर है। मुझे फोरेंसिक मेडिसिन के प्रोफेसर याद आते हैं। “द होल ऑफ इंडिया इस अ टॉयलेट”; वह कहा करते थे। और यह एक बहुत बड़ा और कड़वा सच है। जिसे नज़रंदाज़ करना आपके और मेरे लिए मुश्किल नहीं है। हम हमारे घरों के स्वच्छ कमरों में बैठ अपने टीवी सेट्स पर हाथ धोने की जरूरत के बारे में विज्ञापन देखकर ही अपने कर्तव्य को संपन्न करते हैं।


“Anyone who shirks the topic as repugnant, minimizes it as undignified, or considers unworthy those in need should let others take over for the sake of 1.5 million children and countless others killed each year by contaminated water and unhealthy sanitation,” said Mr. Adeel.


उन लोगों के लिए जो नफा और नुकसान की भाषा समझते हैं ,वे आगे कहते हैं


“The world can expect, however, a return of between $3 and $34 for every dollar spent on sanitation, realized through reduced poverty and health costs and higher productivity – an economic and humanitarian opportunity of historic proportions,” added Mr. Adeel.

वर्ल्ड टॉयलेट ऑर्गनाइज़ेसन के फॉउंडर और प्रेसिडेंट जैक सिम हस विषय में काफी दिलचस्पी लेते हैं । उन्होने इसी दौरान अपनी चिंता प्रकट की थी।

In particular, Sim questioned whether the authorities in New Delhi were doing enough to provide adequate public toilet facilities for the 2010 Commonwealth Games, which will draw tens of thousands of foreign visitors.


उनका कहना था कि अगर हमारे पास शौच के लिए अच्छे और साफ विकल्प नहीं हैं तो हमारे यहाँ पर्यटन उध्यम को भारी नुकसान हो सकता है। उन्होने कहा कि आखिर शौचालय के उपयोग में आने की दर और जरूरत दोनो सँभोग से अधिक और जरूरी है। यह आवश्यकता हर किसी की है। आखिरकार हर किसी को यहाँ जाना होता है। यह एक अच्छा अनुभव होना चाहिए। सुरक्षित और साफ।

वे कहते हैं, हर समस्या व्यापार की सँभावना है। शौचालय का हर जगह होने का मतलब पूरे शहर और पूरे देश की आर्थिक स्थिति का सुधरना है।

और मजाल है जो देश को यह बात समझ ना आई हो। आर्थिक स्थिति में हमारी दिलचस्पी यूँ भी स्वाभाविक है।

1999 में टोटल सैनीटैशन कैम्पेन (टी एस सी) लाँच किया गया।


Total Sanitation Campaign (TSC)


Total Sanitation Campaign is a comprehensive programme to ensure sanitation facilities in rural areas with broader goal to eradicate the practice of open defecation. TSC as a part of reform principles was initiated in 1999 when Central Rural Sanitation Programme was restructured making it demand driven and people centered. It follows a principle of “low to no subsidy” where a nominal subsidy in the form of incentive is given to rural poor households for construction of toilets.




देश भर में इतने टॉयलेट्स.....कितने टॉयलेट्स....
हर रोज़ की मॉनीटरिंग....
टारगेट से बस इतना दूर....ज़रा सा.....


जिस आँगनवाडी में हम बैठे हैं बिजली नहीं है....पानी की सुविधा भी नहीं.....
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आँकड़े कहते हैं इस आँगनवाड़ी में शौचालय है। यह भी बड़ी बात है कि आँगनवाडी है। नहीं तो आँकड़ों के हिसाब से ऐसी आँगनवाडियों में भी शौचालय है जो अस्तित्व में नहीं है।

जिस छोटी सी जगह को आँगनवाड़ी का नाम दिया है ठीक उसके सामने क्यूबौइड जैसा स्ट्रक्चर है...उसपर कपड़े लटके हैं....अंदर लकड़ी रखी है। पूरे गाँव में जगह जगह यह खड़े हैं.....।यही शौचालय हैं। यही गुजरात के टी एस सी की एक छोटी सी कामयाबी है।

यही कहानी ना जाने कितने राज्यों की....

लगभग पूरे देश की...
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लक्ष्मी थोड़ा और थक चुकी है। मैं भी।
कितने बच्चे। और कितनी बिमारियाँ....। जंग चालू है। टायफॉयड,हैपाटाइटिज़,डायरिया,स्किन डिसीसस........।
लक्ष्मी जाना चाहती है।उसका मन अच्छा नहीं है। उबकाई आ रही है।
मुझे भी....
पर कहाँ....किस के पास.....
विकल्प कहीं नहीं है.....
यहाँ सब बीमार हैं....

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और कॉमनवैल्थ गेम्स की तरह ऐसी कोई बात नहीं कि हमारा सामूहिक जज़्बा काम करे.....या प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़े....

हाथ धोने के संसाधन तो नहीं हैं.....
हाथ झाड़ के चले जाने के हैं.......

Tuesday, September 28, 2010

बेमौसम

मौसम अचानक ही बदला है। एकदम गरम दोपहरी पर कहीं बाकी बचे सावन के छींटे पड़े हैं। बादल गरज रहे हैं। और चमकती हुई बिजली भी नीले आसमान पर चुँधिया रही है। मौसम ठंडा हुआ है। बादल चमक, गरज कर भी बरस नहीं पा रहे। जैसे रूदन कहीं गले में ही अटक गया हो....।

बादल आज प्रासंगिक नहीं। जैसे बिना संदर्भ ही बात छिड़ गई हो। और फिर किसी पुराने ना चुकता किए ऋण के व्याज की याद की तरह एक अनकहे दर्द सी उभरी हो।

हिसाब जो निपटाये नहीं जा सके विलीन नहीं होते। समय की सलवटों में कहीं अटके भटके से ठहर जाते हैं। वक्त अपना खाता खुद सँभालता है। और मौका देख अपनी चाल चलता है। पासे पलट जाते हैं। हिसाब गड़मड़ा जाता है।

हमें आदत है राउँड ऑफ करने की। जो फिगर आधे आँकड़े से कम उसे मिटा देना। और जो आधे से ज्यादा वो पूरा एक अंक। हमारे हिसाब पक्के नहीं। समझ भी कच्ची ही है। अनुमान ....हाँ अनुमान ....सही गलत का अनुमान, समझ नासमझ का, निदान और उपचार भी अनुमान....।

जीवन चलता है। संदर्भ बनते बिगड़ते हैं। हम इसके अर्थ खोजते हैं। स्थिति परिस्थिति को ताड़ अंदाज़े से परिणाम की प्रतीक्षा करते हैं।
हमेशा अनुमान सही नहीं होता।

....और बेमौसम बरसात होती है.......