Wednesday, September 30, 2009

अनकही बातें



बातें कहीं भी शुरु हो जाती है. जंगली घास की तरह थोडी सी नमी में पनप जाती है. कभी गोल गोल घूम कर वहीं आ खडी हो जाती है....कभी यूं ही बरसात की तरह बरस जाती है. कभी खेतों सी लहलहाती है.....और उन पर अनाज से लगतें हैं किस्से. बातों बातों में अफसाने उग आते हैं.
शब्दों से संवरती हैं, आवाज़ के जायके में डूब कर ,जज़्बात के लिबास पहन इतराती हैं बातें. कभी हँसी का रस आता है....कभी उदासी हल्की सी लगी होती है. मुस्कुराती हैं बातें ,कभी सुबकती भी हैं ....हर बात को कहने की अदा अलग होती है....
बातें अनकही भी रह जाती हैं. कहने वाले के गले में जज़्बों के दलदल में घँसी.....जितना आवाज़ को थामने की कोशिश करती है...थोडी और गहराई में उतर जाती है. सुनने वाले की तरस किनारे पर खडी ....बेबस, लाचार.... बात को डूबते , दम तोडते देखती है. ऐसी बातों की आवाज़ नहीं होती. यह शब्दों के जेवर नहीं पहनती .... जुदा हुए साये की तरह....बेआवाज़ ....बस गूंज सुनाई देती है.
बात जो कहने से चूक जाती है.....उसकी पकड बहुत मज़बूत होती है. दलदल के नीचे से न निकालो तो मोक्ष का वरदान भी ऐसी बात के बोझ तले दब जाता है.....
कही नहीं जाती जो बातें......वही ज़्यादा सुनाई देती हैं...... भटक ऐसे यह जाती हैं....हर मोड पर मिल जाती हैं.....

Sunday, August 9, 2009

सीमा


परिवेश,सोच,विकास,आज़ादी....सीमा हर चीज़ की होती है। सीमायें अचानक से आकर खड़ी नहीं हो जाती। पहले होता है शोध,संघर्ष,विमर्श और फिर धीरे से बनती हैं सीमायें। युद्ध लड़े जाते हैं, सभ्यता की दिशा का अनुमान लगाया जाता है,विचार की पराकाष्ठा तय की जाती है, सँभावनाओं का आंकलन किया जाता है। और तब पहले कागज़ में, फिर नियमावली में और फिर मनोवृत्ति में सीमाओं की मर्यादा तय की जाती है। प्रशासन और प्रबंध के लिए अहम हैं यह, अधिपति की स्थापना और अनुबंध के लिए अत्यावश्यक। सीमाओं के अंतर्गत एक आश्वासन रहता है। एक सुरक्षित रहने का अहसास..जैसे घर की दीवारों के बीच....। एक अनुशासन ...ट्रैफिक सिग्नल और फास्ट और स्लो लेन की तरह। धरती का मानचित्र लेकर , फिर आड़ी तिरछी रेखाओं से उसे बाँटकर हम देश के नक्शे बनाते हैं....अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अंतर्गत उसे अपना एक दर्जा देते हैं.....सोच समझकर सँविधान बनाते हैं। हमें अनुभव है....सभ्यताओं, धर्म, जाति, रूप,रंग....हम इन सब के आधार पर पहले भी यह कर चुके हैं। सीमाओं के भीतर बहुत कम जोखिम है। हर बात के लिए नियम है, और पूर्वानुमान सँभव। अनिश्चितता के हम आदी नहीं। गणितज्ञ की तरह हम पूरे इलाके का सही क्षेत्रफल जानना चाहते हैं। कैलकुलेट टिल द स्मालेस्ट स्कायेर पॉसिबल।

पता नहीं कितना सहज है गणना। कोई भी सीमा अप्रवेश्य नहीं। घरों की दीवारों में खिड़कियों का होना, हवा का बेहिचक सीमाओं का उल्लँघन करना, बादलों का एक देश से दूसरे में चले जाना........कहीं की बरसात का कहीं की बाढ़ बनना।

ऐसा नहीं कि हम इन सीमाओं के पार नहीं जाना चाहते। उसके लिए भी प्रावधान है....विसा, इमिग्रेशन, धर्म परिवर्तन,.....। ट्रैफिक में तक स्लो से फास्ट और फास्ट से स्लो में जाने का प्रावधान है। नियम हैं...नियमावली है....। नियमावली के नीचे फिर एक सीमा है।

सीमाओं का मतलब सब के लिए अलग है। यू एन डिप्लोमैट की और पंचायत कर्मी की अलग सीमायें हैं, नौजवान लड़की की तालीबान और अमेरिका में , सड़क पर अधिकतम स्पीड़ की यू ए ई और भारत मेंअलग सीमायें हैं।

सीमाओ का उल्लँघन भी स्वाभाविक है.....
फ्लू के वायरस को तक तमीज़ नहीं कि एक जानवर, जाति, प्रजाति तक सीमित रहे।

सीमाओं की सीमायें सीमित नहीं.....विचार ,उद्भेद और सँभावनायें अपार हैं.....

इनका अतिक्रमण बस होने को है....

शायद जरूरी भी.....

शायद अगले स्तर तक पहुँचने के लिए सीमा एक सोपान मात्र.......

Monday, June 8, 2009

मिट्टी और जंगल

वह मिट्टी थी। उस पर एक जंगल उगा था। जंगल जिसकी जड़ें बहुत भीतर उतर कर उसकी रूह को टटोलती थी। कहीं गहरे से नमी खोज लाती थी। ऐसी नमी जिससे जंगल पनपता था। फूल खिलते थे...फल लगते थे। हरियाली,वसंत,पँछी,पखेरू...। वह देना जानती थी। हल्की बारिश में सौंधी खुशबू सा महकना जानती थी। बीज को अंकुरित कर वृक्ष बनाना जानती थी। उसके पास बीज में सोये हुए वृक्ष को जगाने का जादुई मंत्र था। वह मिट्टी थी। जंगल की पकड़ में सिमटी हुई। जंगल के सूखे गले पत्ते... टूटी डालियाँ...मुरझाये फूल ..वह यह सब सहेजना जानती थी।

जंगल के लिए वह जीवन थी.......जादू थी....ज़मीं थी.......

मिट्टी के लिए जंगल एक वजह थी....जिसके लिए वह थमी थी...... खड़ी थी...।

Saturday, June 6, 2009

तलाश

ऐसे लगता है जैसे किसी राह की तलाश में जीवन की चेतना पाई हो। और रास्तों के पड़ावों में ना रास्ता याद रहा ना तलाश। जैसे किसी सपने के उगने पर...जागी आँखों के सच धुँधले से पड़ जाते हैं। और सपने के ही मायने दिखाई देते हैं। ऐसे बँधता है मन लगावों के तारों से...कि छटपटा कर सपने में ही कैद होकर रह जाता है। नींद से जगना फिर भी आसान ही है...अधूरी चेतना से जागना बहुत मुश्किल। कहीं कोई चेहरा, कोई खुशबू, कोई स्वाद,कोई स्पर्श ...कोई आवाज़ बहुत अपनी सी नज़र आती है। उसके अपनेपन की वजह भूल जाती है। जैसे किसी दिमागी आहत इंसान से याददाश्त अधूरी खोई हो। पहले इन उलझे हुए तारों में उलझते हैं....फिर इन्हे सुलझाते हुए समय गुजर जाता है। तलाश अक्सर अधूरी ही रह जाती है। इस पड़ाव के आगे ना निकल पाते हैं....और किसी शाप की तरह फिर फिर उसी सपने से गुजर जाते हैं। कभी सोचती हूँ...उस पत्ते के बारे में ....जो जिस्म पहन कर टिड्डे की तरह उड़ सका.....। उस गिरते हुए पँख को देख कर आश्चर्य होता है ...किस तरह पानी में जीवित होकर तैर सका।

.....शायद आता है हम सभी के पास एक ऐसा पल...जहाँ हम फिर रास्तों तक हाथ बढ़ा सकते हैं...। तलाश से मंजिल की तरफ......चेतन, अभिज्ञ। किसी स्क्रिप्ट से पढ़ी कहानी की तरह नहीं। हर निमिष में सजीव रह...अपने रास्ते ...अपनी तलाश तक पहुँच सकते हैं।

उलझे हुए सायों के बीच से कोई रौशनी की पगडंडी सी चेतना.....जो तलाश पर उजाले बिखेर जाती है...।

Photo credit-Cosmic hand NASA

Monday, April 13, 2009

विलीन


तुम उस खुशबू के समंदर सी हो जो लहर लहर सी उठ कर मुझे किनारे से उठा ले जाती है। मेरी साँसों मे घुल यह महक मेरे पोर पोर तक पहुँचती है। तुम्हारी पहचान है इसमें। मुझ तक यह तुम्हारा नाम बन कर आती है। मैने इसे जिस्म पहनते देखा है। और तुम्हारे जिस्म को खुशबू में बदलते देखा है। छूता हूँ तुम्हे तो तपिश में मोम सा पिघलकर जुड़ता ही चला जाता हूँ। तुम्हारे साँचे में ढ़लता ही चला जाता हूँ। मुझे अपने बुलबुलों में बसा कर लहर सी उठती गिरती हो। असमंजस,अनुराग और फिर समर्पण....धूप सा तैरता है तुम्हारी आँखों में...। मैं इन बुलबुलों के भीतर उठता,उभरता हूँ....गिरता उतरता हूँ। तुम्हारी साँसों को चखता हूँ। तुम्हारा स्वाद..। उस अमृत की तरह जो मुझे जीवित करती है। तुम जीवन की तरह दौड़ती हो मेरी नब्ज़ में। तुम्हारा प्रवाह, तुम्हारी गति, उथल पुथल, बेचैन....अपनी धड़कनों पर तुम्हारे लय को महसूस करता हूँ। थक कर ही शायद रुकती हो तुम...मेरे आलिंगन की सीमाओं में ठहरती हो तुम...। छलकती सी तुम...सँभालता हूँ तुम्हे अपने आगोश में....और तुम सिमटती सी चली आती हो। मैं साँस रोक कर सुनता हूँ तुम्हे....तुम्हारी खुशबू में महकता हूँ...। हाँ बस तब ही बदल जाती हो...सिर्फ खुशबू बन जाती हो...मेरी पकड़ से आज़ाद फिर छलक जाती हो। निर्दोष सी कोई हँसी की धुन की तरह...किसी चंचल भोली ललक की तरह...। अपनी गहराई की थाह समझ पाने की चाह...चाँदनी को ओढ़ लेने की आस....सैलाब सा उठती हो तुम....फिर खुशबू में बिखर जाती हो....। मुझे साथ लेकर ....उठ हवा में चल....मेरे साथ...

...बूँद सा मैं...तेरे सतरंगी खुशबू में नम...

तेरे साथ ही फिर ..........सावन सा बरस जाता हूँ....।

Sunday, April 5, 2009

विश्राम


रात थी। और सन्नाटा बिल्किल चुप्प। जैसे बहुत दिनों तक जागने के बाद अनायास ही रात की आँख लगी हो। पत्ते अपनी टहनियों से लटके खड़े थे। बिल्ली आँख मूँदे सो रही थी। उजालों का कहीं नामोनिशाँ नहीं था। सड़क सूनी थी। कोई बत्ती कहीं दूर तक नहीं टिमटिमा रही थी। वह अमावास की रात थी। चाँद भी सायों को ओढ़ कर सो रहा था। हवा स्तब्ध सी खड़ी थी। कभी दबे पाँव अपना भार दूसरे पैर पर टिका देती।

वह सो रहा था। उसकी साँसों की आवाज़ की लय में और भी किसी की साँसे शामिल थी। सुकून से ली गई साँसे जो आत्मा को पँखा झल रही हों। रात सो रही थी। और नींद सब पर पहरा लगाये थी।


इस रात में करवटें नहीं थी....कोई आधे अधूरे...धुँधले हल्के ख्वाब नहीं थे....बस नींद...।

कल एक नया सवेरा था जिसमें थकान नहीं थी।

(पेंटिंग-Evelyn De Morgan-sleep and night)

Tuesday, March 17, 2009

दोपहरी

मार्च एप्रिल का महीना। घनी छाँव सी छनी धूप घर के पिछवाड़े पर पड़ती थी। धूप ,छाँव पहन थोड़ी सी ठंडी होकर गुनगुनी सी बदन को छूती थी। नींबू के पौधों से हल्की सी खट्टास ताज़गी की तरह उठती। मुझे यहाँ बैठना अच्छा लगता था। गर्म हवायें आम के पेड़ की साँसों की तरह चेहरे पर महसूस होती । यहाँ मुझे अकेला नहीं महसूस होता। पत्तों की सरसराहट से लेकर कोयल की कूक सब जाना पहचाना था। कभी अचानक से पकी इमली टप्प सी गिर जाती। बहुत सी आवाज़ों के बीच सुकून सी नि:शब्दता।
सिमेन्ट के चबूतरे पर बैठ छोटे पछीटों को हथेली से उछालती और कल्पना उड़ान भरने लगती। डॉक्टर, इंजीनियर, एस्ट्रानॉट...गुड़िया की शादी के सपने,बड़ी सी गाड़ी के सपने....अच्छे चमकीले कपड़े....ढ़ेर सारे चाभी से चलने वाले खिलौने....। चबूतरे पर जमी लाल मिट्टी पर पाँव चलाती और समंदर के किनारे की रेती को छू आती। पास ही बेल थी..एक घनी बेल जिसपर मोगरे गुच्छों मे खिले होते....उनकी महक हवा में घुली होती। थोड़ा पानी बाल्टी में लेकर, मग के मुँह पर हाथ रख बेल पर पानी छिड़क देती...। मोगरे नहा कर...उछल खूद बेल पर लहराने लगते। और मैं सोचती एक बाड़ी...जिस पर मोगरे ही मोगरे हों..., नीचे साफ सुथरी पक्की क्यारी और बाड़ी पर लगा एक सफेद गेट।

घर के पिछवाड़े की बाड़ी छोटी टहनियों को गूँथ कर पापा ने रामू की मदद से बनाई थी। छोटी मोटी यहाँ वहाँ मुड़ी टहनियाँ कैसे तो पंक्ति में बँध गई थी। धीरे धीरे सँभल कर मैं उनपर हाथ चलाती। चिकनी, फिर खुरदुरी...बीच में काँटे। एक कोने से हिलाओ तो मिट्टी फिसल कर सरक सरक नीचे गिरती।


आँख बंद कर फेफड़ों को फैला कर भरी पूरी एक साँस लेती....और मार्च एप्रिल का जायका मेरे जहन में समा जाता...। पूरे साउँड और विश्अल एफेक्ट्स के साथ।

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महीना मार्च ही है। गर्म हवायें भी हैं। बड़ी सी गाड़ी की स्टीयरिंग व्हील थामे....प्यारी सी गुड़िया को रियर सीट में बैठा कर...फूलों की क्यारियों के बीच से गुजरते हुए.....कैसे तो मन फिर उसी दोपहरी के लिए तरसा है.......।